हिन्दुओं, आश्रम, मन्दिर एवं गोमाताके प्रति अपनी वृत्तिका आत्मनिरिक्षण करें !


हिन्दुओंकी स्थिति इतनी विदारक कैसे है एवं उनकी वृत्ति ही इसके लिए कैसे उत्तरदायी है आज यह आपको बताना चाहती हूं !
       अगस्त १९९९ में मैं झारखण्डके धनबाद जनपदमें धर्मप्रसारकी सेवा अन्तर्गत एक सुप्रसिद्ध मन्दिरके सामने हामरे श्रीगुरुद्वारा संकलित ग्रन्थोंका ‘स्टॉल’ लगाकर धर्मप्रसारकी सेवा किया करती थी । एक दिवस मेरे पास छुट्टे पैसे नहीं थे तो मैं उसी मन्दिरके एक विश्वस्त जिनसे मेरा परिचय हो गया था, उनसे कुछ छुट्टे पैसे मांगे । वे मुझे बोले आप अपनी केन्द्रके समापनके पश्चात मेरे पास आना आपको जितने छुट्टे पैसे चाहिए आपको दे दूंगा । जब मैं उनके पास गई तो उन्होंने ताला खोलकर एक ‘सन्दूक’ दिखाया उसमें भरे हुए फटे नोट थे उन्होंने कहा, “देखो बिटिया लोग भगवानको कैसे नोट अर्पण करते हैं, सोचते है पत्थरकी मूर्ति कुछ बोलेगी थोडे ही ।” मैं भी इतने सारे कटे-फटे नोट देखकर आश्चर्यचकित रह गई !
    ऐसे ही एक बार देहली आश्रममें एक व्यक्ति आए । वे गुरुग्रामकी एक बहुत ही महंगे ‘कॉलोनी’में रहते थे उनके भवनका (बंगला) मूल्य २० कोटि रुपए तो अवश्य ही होगा, वे अपनी किसी समस्याके समाधान हेतु हमारे पास आए थे और हमारे आध्यात्मिक उपचार केन्द्रके सदस्य थे । वे बहुत ही स्वार्थी प्रवृत्तिके थे । वे मात्र अपनी स्वार्थसिद्धि हेतु आते थे । एक दिवस उन्होंने किसी साधकको आश्रममें किसी कार्यक्रमके निमित्त फल लाते देखा तो अगले दिवस उन्होंने भी कार्यक्रममें सहभागी होनेकी इच्छा दर्शाई । अगले दिवस वे पांच किलो नारंगी लेकर आए; किन्तु वे जो नारंगी लाए थे उसे देखकर लगा कि मात्र वे सबको दिखाने हेतु एक टोकरा फल लाए थे, उसमें एक किलो नारंगी भी खाने योग्य या किसीको देने योग्य नहीं थी, वे सब या तो सूखी हई या सडी हुई थी और ऐसा भी नहीं था कि वे बन्द थीं और उन्होंने देखा नहीं था, ऊपरसे केवल एक किलो नारंगी अच्छी थी और शेष सब फेंकने योग्य ही थी । अगले दिवस वे चाहते थे कि मैं उनकी नारंगीकी स्तुति सबके समक्ष करूं ! मैंने उनसे पूछा कि क्या फलवालेने आपको बिना दिखाए नारंगी दी थीं ? तो उन्होंने कहा, “नहीं ! मैंने स्वयं ही खडे होकर ली थीं ।”
        वैसे ही उपासनाकी गोशालामें गायके लिए दलिया लेने हेतु जब भी किसी विक्रेतासे बात होती है तो वे ऐसा अन्न दिखाते हैं कि उसे गोवंशको खिलाया ही नहीं जा सकता है, यह अनेक बार हो चुका है । अभी कुछ दिवस पूर्व हमने जो गायें दूध देती हैं, उन्हें देने हेतु दालें मंगाई थी; जब उसके बोरेको खोलकर देखा तो ज्ञात हुआ कि उसमें आधे चने और आधे भागमें मिट्टी और कंकड है ! मैं सोचमें पड गई कि ये तो किसी भी स्थितिमें गोमाताको नहीं खिलाए जा सकते और वर्षाकाल है तो उन्हें धोकर सूखा भी नहीं सकते हैं । विक्रेताने वैसे ही चने दिए, वे भी थोडे सडे हुए हैं और शेषमें घुन है ।
   अब मुझे समझमें आता है कि आजका हिन्दू इतना दु:खी क्यों है ? उसे उसकी वृत्ति अनुरूप ही दुःख मिलता है !


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