हिन्दू बोलें तो घृणास्पद भाषण और अहिन्दू बोलें तो वह अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता, यह कबतक चलेगा ?


१९ जनवरी, २०२२
उत्तराखंडके हरिद्वारमें दिसम्बर,२०२१ में सम्पन्न धर्मसंसदमें मुसलमानोंके सम्बन्धमें आपत्तिजनक विधान बतानेके लिए श्री. जितेंद्र नारायण त्यागीके (पूर्वके वसीम रिजवीके) पश्‍चात अब यति नरसिंहानंद सरस्वतीजीको भी हरिद्वार पुलिसने बन्दी बना लिया है । आपत्तिजनक विधान वार्तापर हिन्दू नेताओं एवं सन्तोंको बन्दी बना लिया जाता है; परन्तु वसीम रिजवीका शिरच्छेद करनेके लिए लाखों रुपयोंका पुरस्कार घोषित करनेवाले हैदराबादके कांग्रेस नेता मोहम्मद फिरोज खान एवं रशीद खान, साथ ही मुसलमानोंपर काल्पनिक अत्याचारोंके प्रकरणोंमें उत्तर प्रदेश पुलिसको ‘खुलेआम’ धमकानेवाले ‘एमआईएम’के सांसद असदुद्दीन ओवैसीपर कोई भी कार्यवाही नहीं होती । इस देशमें हिन्दुओंके लिए एक न्याय और मुसलमानोंके लिए दूसरा न्याय क्यों दिया जाता है ?
उल्लेखनीय है कि कुछ दिवस पूर्व छत्तीसगढसे कालीचरण महाराजजीको गांधीजीके विषयमें आपत्तिजनक वक्तव्यके कारण बन्दी बनानेका प्रकरण अभी नूतन ही है । अनेक हिन्दूद्रोही नेता हिन्दू देवता, सन्त, धर्मग्रन्थोंपर तथा वीर सावरकरके विषयमें अत्यधिक निचले स्तरपर जाकर बोलते हैं; परन्तु वह अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता होती है । और हिन्दू बोलें तो घृणास्पद भाषण ! हिन्दुओंका धर्मग्रन्थ मनुस्मृति तो सार्वजनिक रूपसे जला दिया जाता है; परन्तु तब भारतीय शासनद्वारा जलानेवालोंपर कोई भी कार्यवाही नहीं होती ।  हिन्दू सन्तों और नेताओंको पकडकर हिन्दुओंका स्वर दबानेका प्रयास किया जा रहा है, अब हिन्दू समाज कदापि सहन नहीं करेगा । ऐसा हिन्दू समितिने कहा है ।
        उपर्युक्त प्रकरणसे ज्ञात होता है कि हिन्दू बहुल भारत देशमें भारतीय शासन भी अहिन्दुओंकी उपेक्षा करता है; क्योंकि हिन्दू संगठित नहीं हैं । हिन्दू सन्तोंपर अत्याचार हिन्दुओंके असंगठित और धर्म कर्तव्य पालन न करनेका परिणाम है; अतः हिन्दुओंका संगठित होने अनिवार्य है । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
 


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