हिन्दू धार्मिक व धर्मार्थ विभागके विश्वविद्यालयमें सुहैलको चाहिए चाकरी, मद्रास उच्च न्यायालयमें प्रकरण
२२ अक्टूबर, २०२१
मद्रास उच्च न्यायालयमें एक प्रकरण आया है । एक मुस्लिम व्यक्ति एक हिन्दू धार्मिक संस्थामें कार्य करना चाहता है; यद्यपि इस पदके लिए केवल हिन्दू ही आवेदन कर सकते हैं । इसके विरुद्ध ए. सुहैल नामके मुसलमान व्यक्तिने उच्च न्यायालयमें याचिका प्रविष्ट की है । यह प्रकरण चेन्नईके अरुलमिगु कपालिश्वरार कला व विज्ञान महविद्यालयसे सम्बन्धित है । इसकी स्थापना तमिलनाडु हिन्दू धार्मिक व धर्मार्थ प्रबन्धन विभागके द्वारा की गई है ।
ए. सुहैलने उच्च न्यायालयमें अपनी याचिकामें कुछ तर्क देते हुए कहा, “केवल हिन्दू ही आवेदन कर सकते हैं ।” इस उपबन्धके (शर्तके) कारण वह महाविद्यालयमें कार्यालय सहायकके पदके लिए साक्षात्कारमें (इंटरव्यूमें) सम्मिलित नहीं हो सका और सर्वोच्च न्यायलयने व्याख्या दी है कि ‘हिन्दू’ शब्द किसी धर्मको नहीं दर्शाता है, हिन्दू एक धर्म नही; अपितु जीवनका एक प्रकार है, तो कोई भी आशान्वित हिन्दू है या नहीं, इसको कैसे निश्चित किया जा सकता है ? इसलिए भारतीय मुसलमानों या भारतीय ईसाइयों या किसी भी अन्यको महाविद्यालयमें आवेदन करनेसे नहीं रोक सकता ।
याचिकाकर्ता आगे कहता है कि संविधानमें स्पष्ट है कि धर्मके आधारपर राज्य भेदभाव नहीं कर सकता है; इसलिए चाकरीके (नौकरीके) लिए लगाया गया उपबन्ध कि केवल हिन्दू ही उस पदपर नियुक्त होनेके पात्र हैं, असंवैधानिक है । हिन्दू कट्टरपन्थी वर्तमान शासनकी आलोचना करते हैं कि वह हिन्दूविरोधी है । ऐसेमें इस प्रकारकी आलोचनासे बचनेके लिए ही महाविद्यालय या विभागने हिन्दुत्व विचारधाराके प्रसारका उपाय अपनाया, केवल हिन्दुओंको नियुक्त करनेका निर्णय लिया । शैक्षणिक और अशैक्षणिक पदोंका धार्मिक कार्योंसे कोई लेना-देना नहीं है । ऐसे पदोंके लिए सभीको प्रतिस्पर्द्धा करनेकी अनुमति दी जानी चाहिए, चाहे प्रत्याशीका धर्म कुछ भी हो ।
अब ये जिहादी, हिन्दुओंके क्षेत्राधिकारको चुनौती देनेका साहस भी दिखाने लगे हैं ! इसके पूर्व, गत वर्ष काशी विश्वविद्यालयमें भी इसी प्रकारका प्रकरण हुआ था, जिसमें मुसलमान प्रत्याशीको, हिन्दुओंके दबावके कारण स्वयं ही पीछे हटना पडा था । क्या यह केवल एक प्रकरण विशेषकी बात है या किसी प्रकरणको उदाहरण बनाकर, वर्तमान विसंगत विधानोंका लाभ उठाकर, सम्पूर्ण हिन्दू तन्त्रको नष्ट करनेका षड्यन्त्र है ? यह सत्य हो सकता है कि वर्तमान नियमोंके अनुसार, किसी भी विधर्मीको, ऐसी चाकरीसे न रोका जा सके; अतः आवश्यकता अब ऐसे विधानोंको ही परिवर्तित करनेकी है । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
स्रोत : ऑप इंडिया
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