भारतमें निजी वैद्यकीय महाविद्यालयोंमें जातिवाद और ‘घूसखोरी’के कारण बुद्धिमान विद्यार्थी शिक्षाके लिए विदेशमें जाते हैं !


३ मार्च, २०२२
        वैद्यकीय महाविद्यालयोंमें जातिवाद और ‘घूसखोरी’के कारण चिकित्सक बननेके लिए विद्यार्थी युक्रेन जा रहे हैं, ऐसा आरोप युक्रेनमें रशियाके ‘हवाई’ आक्रमणमें मारे गए वैद्यकीय शिक्षा ले रहे भारतीय विद्यार्थी नवीन शेखरप्पाके पिता शेखरप्पा ज्ञानगौडाने किया ।
         शेखरप्पा ज्ञानगौडाने कहा, “निजी महाविद्यालयोंमें वैद्यकीय शिक्षा पानेके लिए करोडों रुपए व्यय करने पडते हैं । इस कारण ही वैद्यकीय शिक्षा लेना देशमें कठिन हो गया है । मैं राजकीय प्रणाली, शिक्षा व्यवस्था और जातिवादके कारण दु:खी हूं; कारण सभी कुछ निजी संस्थाओंके नियन्त्रणमें है । मेरे लडकेको १० वीं में ९६ प्रतिशत, १२ वीं में ९७ प्रतिशत अङ्क मिले थे; इसलिए उसने चिकित्सक बननेका स्वप्न देखा था । शिक्षाप्रणाली और जातिवादके कारण उसे वैद्यकीय शिक्षा पानेके लिए वैद्यकीय महाविद्यालयोंमें स्थान नहीं मिला । वह बुद्धिमान विद्यार्थी था । महाविद्यालयोंमें वैद्यकीय स्थान पानेके लिए १-२ करोड रुपए उत्कोच देनी पडती है । युक्रेनमें कुछ लाख रुपयोंमें वैद्यकीय शिक्षा मिलती होगी, तो भारतमें ‘करोडों’ रुपए व्यय क्यों करे ? युक्रेनमें अच्छी शिक्षा मिलती है और भारतकी तुलनामें वहांके उपकरण भी अच्छे हैं ।”
         भारतीय दूतावासके किसी भी व्यक्तिने खारकीवमें फंसे भारतीय विद्यार्थियोंसे सम्पर्क नहीं किया, ऐसा प्रतिवाद शेखरप्पा ज्ञानगौडाने किया । खारकीवमें सहस्रों भारतीय विद्यार्थी फंसे हैं और वे शिविरोंमें रह रहे हैं ।
     चिकित्सक कलाके क्षेत्रमें भारतको पुनः परिपूर्ण बननेके लिए आयुर्वेदका आश्रय लेना चाहिए; तभी तेजस्वी छात्र अनावश्यक विदेश गमन टालेंगे । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
 


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