विकासके नामपर तीर्थस्थलोंको पर्यटनस्थल मत बनाइए !
१४ जून, २०२२
प्राचीन कालमें अंकोर वाट, हम्पी, आदि भव्य मन्दिरोंका निर्माण करनेवाले राजा-महाराजाओंने उनका उत्तम व्यवस्थापन किया था । इन मन्दिरोंके माध्यमसे गोशालाओं, अन्नक्षेत्रों, धर्मशालाओं, शिक्षाकेन्द्रों आदि चलाकर समाजकी अमूल्य सहायता की जाती थी । उसके कारण ही हिन्दू समाज मन्दिरोंसे जुडा रहता था; परन्तु वर्तमान समयमें मन्दिरोंका इतना व्यापारीकरण हुआ है कि ये मन्दिर व्यापारिक संकुल (शॉपिंग मॉल) बन चुके हैं, साथ ही विकासके नामपर तीर्थस्थलोंको पर्यटनस्थल बनाया जा रहा है । इसे रोकना आवश्यक है; इसलिए मन्दिरोंके न्यासियोंको और पुरोहितोंको मन्दिरोंका आदर्श व्यवस्थापन करना चाहिए । इसे करनेके लिए ‘मन्दिरोंका आदर्श व्यवस्थापन’ (दी टेम्पल मैनेजमेंट) यह पाठ्यक्रम चलाना चाहिए; इस विषयपर ‘हिन्दूराष्ट्र संसद’में विचार मन्थन किया गया । १३ जूनको दशम अखिल भारतीय हिन्दू राष्ट्र अधिवेशनके द्वितीय दिवस ‘मन्दिराेंंका सुव्यवस्थापन’ इस विषयपर इस हिन्दू राष्ट्र संसदमें विभिन्न मन्दिरोंके न्यासियों, श्रद्धालुओं, अधिवक्ताओं और हिन्दुत्वनिष्ठोंने अपने अभ्यासपूर्ण विचार व्यक्त किए । अन्य मान्यवरोंने भी विचार मन्थन किया । इस संसदमें सभापतिके रूपमें भुवनेश्वरके (ओडिशा) ‘भारत रक्षा मंच’के राष्ट्रीय महामन्त्री अनिल धीर, उपसभापति ‘हिन्दू जनजागृति समिति’के धर्मप्रचारक सन्त पू. नीलेश सिंगबाळजी और सचिवके रूपमें ‘हिन्दू जनजागृति समिति’के मध्यप्रदेश तथा राजस्थान राज्य समन्वयक श्री. आनंद जाखोटियाने कार्य देखा ।
कलिकालमें वैदिक मन्दिरोंकी महिमाको विस्मरण और तिरस्कृत करनेसे वैश्विक स्तरपर दैहिक, दैविक व भौतिक रूपसे घोर सन्तापग्रस्त हुए है । प्रत्येक मन्दिर धर्मशिक्षण, भागवत प्रकाश व परात्माकी पराज्योतिका केन्द्र बने, इस दिशामें अथक प्रयास करने चाहिए; जिससे वर्तमान और भविष्यकी मानव जाति सर्वोत्कृष्ट बन सर्वत्र सत्ययुगसे भी सर्वोत्तम अवस्था धरामें सदैव बनाए रखे । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
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