एक व्यक्तिने कुछ दिवस पूर्व एक गोष्ठीमें पूछा था कि जाति आधारित संघर्षसे यह समाज मुक्त कैसे हो सकता है ?
उत्तर बडा सरल है, स्वतन्त्रता पश्चात सत्तासीन शासनकर्ताओंने इस निधर्मी लोकतन्त्रमें जातिको आधार बनाकर राज किया है और इसके पोषण हेतु जातिगत संघर्षको बढावा दिया है; इसलिए इस संघर्षको रोकनेका एकमात्र पर्याय है, ‘धर्म अधिष्ठित हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना करना’ ! गत कुछ शतकोंसे धर्मके ह्रासके कारण ही जात-पातका भेदभाव प्रबल होता गया, धर्म-संस्थापनासे स्वतः ही जाति व्यवस्था नष्ट होकर, वर्ण-व्यवस्थाकी पुनर्स्थापना होगी ! इस तथ्यका आपको प्रमाण चाहिए तो किसी भी उच्च कोटिके सन्तके आश्रममें जाकर देखें, वहां आज भी आश्रमवासियोंका जीवन वर्ण व्यवस्थापर आधारित है ! हमें मात्र उस व्यवस्थाको व्यापक रूप देने हेतु आश्रम समान रामराज्य रुपी हिन्दू राष्ट्र इस देशमें लाना होगा । इस हेतु व्यष्टि और समष्टि जीवनमें ‘अधिकसे अधिक’ हिन्दुओंद्वारा धर्मका पालन और प्रसार करना व समाज कण्टकोंसे राष्ट्र एवं हिन्दू धर्मका रक्षण करना होगा । जातिगत संघर्ष स्वतः ही समाप्त हो जाएगा !
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