गतसङ्गास्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥ – श्रीमदभगवद्गीता (४: २३)
अर्थ : जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गई है, जो देहाभिमान और ममतासे रहित हो गया है, जिसका चित्त निरन्तर परमात्माके ज्ञानमें स्थित रहता है, ऐसा केवल यज्ञसम्पादनके लिए कर्म करनेवाले मनुष्यके सम्पूर्ण कर्म भलीभांति विलीन हो जाते हैं |
भावार्थ : यह सृष्टि कर्मप्रधान एवं एक विशाल कर्मक्षेत्र है अतः यहां सभीको कर्म करना ही पडता है | जिस व्यक्तिने अपनी साधनाके बलपर विषय आसक्तियोंका त्याग किया होता है, जिसने सारे षडरिपु – काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सरका नाश किया होता है और जिनका चित्त नित्य ईश्वरके अनुसंधानमें स्थित रहता है ऐसे योगीके सर्व कर्म कर्मयोगके सिद्धान्त अनुसार होते हैं अतः उनके कर्मका फल निर्माण नहीं होता | वे सारे कर्म मात्र यज्ञसंपादन हेतु करते हैं | अर्थात उनके सर्व कर्म या तो ईश्वर आज्ञा अनुरूप होते हैं या जग कल्याण हेतु होते हैं | देह अभिमान जिनका नष्ट हो जाता है वे अपने सर्व कर्मका कर्तापन ईश्वरको निरपेक्ष भावसे अर्पण कर कर्मरत रहते हैं | अतः कर्म करनेपर भी उनके कर्म अकर्म होते हैं |-तनुजा ठाकुर
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