
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥ – (श्रीमदभगवद्गीता -२.४७)
अर्थ : तेरा कर्म करनेमें ही अधिकार है, उसके फलोंमें कभी नहीं । इसलिए तू कर्मोंके फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करनेमें भी आसक्ति न हो ॥
भावार्थ : कर्मयोगका यह एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है जिसके अनुसार निष्काम कर्म करना चाहिए और कर्मसे फलकी अपेक्षा नहीं होना चाहिए | यह कहना अत्यधिक सरल है; परन्तु इसे कृतिमें लानेके लिए सतत निष्काम भावसे कर्म करनेका अभ्यास करना पड़ता है | आरंभमें कर्म करनेपर फलकी ओर सहज ही विचार चला जाता है; किन्तु मनका बौद्धिक अभ्यास कर उसे बार-बार बताना पड़ता है कि हमारा हेतु निष्काम कर्म करना और फल अच्छा हो या बुरा तब भी पूरी लगनसे कर्म करते रहना है | कर्मका फल अच्छा या बुरा हो तब भी मनको यदि वह तनिक भी विचलित न करे तब ही समझें कि निष्काम कर्मकी ओर हम मार्गक्रमण कर रहे हैं | कर्म यदि अकर्तापन युक्त तब ही उसके फलकी ओर विचार नहीं जाता और भान होता है कि चूंकि ईश्वर मेरे सर्व कर्मके कर्ता हैं और मैं मात्र एक कठपुतली हूं अतः उस कर्मका फल ईश्वरेच्छा अनुसार होगा और वह मुझे पूर्ण रूपेण स्वीकार होगा यह दृष्टिकोण मनमें अंकित हो जाता है | कर्मयोगके इस सिद्धान्तको उच्च कोटिके ज्ञानमार्गी ही पालन कर सकते हैं |-तनुजा ठाकुर
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