किस अधिनियमके अन्तर्गत ‘मस्जिदों’में उच्च ध्वनि प्रसारकका उपयोग, कर्नाटक शासनसे उच्च न्यायालयने किया प्रश्न
१८ नवम्बर, २०२१
उच्च न्यायालयने कर्नाटक शासनसे प्रत्यक्ष रूपसे प्रश्न किया है कि ‘मस्जिदों’पर लगे उच्च ध्वनि प्रसारक यन्त्रोंकी अनुमति, किस अधिनियमके अन्तर्गत दी गई है ? ‘थानिसंद्रा मेन रोड’ स्थित ‘आइकॉन अपार्टमेंट’के ३२ निवासियोंने ‘लाउडस्पीकर’ और ‘माइक’से हो रहे ध्वनि प्रदूषणको लेकर, १६ ‘मस्जिदों’के विरुद्ध, जनहित याचिका प्रविष्ट की थी । न्यायालयमें अभिवक्ता श्रीधर प्रभुने कहा कि उच्च ध्वनि प्रसारक यन्त्र (लाउडस्पीकर) और ‘माइकों’के प्रयोगको चलानेकी अनुमति नहीं दी जा सकती । नियम ५ (३) के अनुसार, ‘लाउडस्पीकर’के प्रयोगको प्रतिबन्धित करता है । ये नियम राज्य शासनद्वारा मात्र १५ दिवस प्रति वर्ष, किसी धार्मिक, सांस्कृतिक या त्योहारपर कुछ समयके लिए प्रयोगकी अनुमति दे सकते हैं । अभिवक्ताके अनुसार, कर्नाटक ‘वक्फ बोर्ड’को ऐसे प्रकरणोंमें अनुमति देनेका अधिकार नहीं है । ‘मस्जिद’ पक्षसे इस याचिकाका विरोध किया गया और कहा गया कि उन्होंने ‘पुलिस’से अनुमति ली थी और प्रतिबन्धित समय, १० से ६ बजेके मध्य भी नहीं बजाया जाता । कर्नाटक उच्च न्यायालयने माना था कि ‘लाउडस्पीकर’से ‘अजान’पर प्रतिबन्ध वैध है; क्योंकि यह इस्लामका भाग नहीं है । उन्होंने कहा था कि किसी भी ‘मस्जिद’से ‘लाउडस्पीकर’से ‘अजान’ करना, दूसरे लोगोंके अधिकारोंमें हस्तक्षेप करना है और दूसरोंको सुननेके लिए विवश करनेका अधिकार किसीको भी नहीं है ।
धर्मान्ध किसी भी अधिनियमका पालन नहीं करते; अपितु कोलाहल करके ध्वनि प्रदूषण करते हुए, अन्योंको सुननेके लिए विवश करते हैं । समूचे देशमें ऐसे प्रदूषणोंको रोकनेके लिए सर्वोच्च न्यायालयद्वारा त्वरित कठोर पग उठाए जाने आवश्यक हैं । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
स्रोत : ऑप इंडिया
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