जनवरी ६, २०१९
उच्चतम न्यायालयने बुधवार, ६ जनवरीको केरलके सबरीमला मन्दिरमें प्रत्येक आयुकी महिलाओंको प्रवेशकी अनुमति देनेवाले अपने निर्णयपर पुनर्विचार करनेकी मांगवाली याचिकाओंपर सुनवाई आरम्भ की तो ‘त्रावणकोर देवस्वओम बोर्ड’ने मन्दिरमें सभी महिलाओंके प्रवेशको अनुमति देनेवाले निर्णयका समर्थन किया ।
न्यायखलयने जब इस परिवर्तनके लिए पूछा तो समितिके अधिवक्ताने (वकीलने) कहा कि अब उसने निर्णयका सम्मान करनेका निर्णय किया है । समितिकी ओरसे वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदीने कहा, “संविधानका अनुच्छेद २५(१) सभी नागरिकोंको अपने धर्मको माननेका समान अधिकार देता है ।”
उच्चतम न्यायालयने सुनवाईके पश्चात अपने निर्णयको सुरक्षित रख लिया है । न्यायालयसे सबरीमला मंदिरमें प्रवेश कर चुकीं दो महिलाओंने यह निर्देश देनेका अनुरोध किया कि १२ फरवरीको अगलीबार मन्दिर खुलनेपर उन्हें पुनः प्रवेश करने दिया जाए ।
“दो महिलाओंके अहंकारकी पुष्टि करते हुए सभी हिन्दुओंका अपमान करनेपर क्या न्यायालयको लज्जा नहीं आती है ? और केरलके निधर्मी शासनकी अनुगामी देवस्वओम समिति प्रत्यक्ष उदाहरण है कि कोई भी हिन्दू देवालय शासनके अधीन क्यों नहीं होना चाहिए ? विज्ञान रहित संविधान किसप्रकार धर्मके वैज्ञानिक सिद्धान्तोंको प्रतिपादित कर सकता है ? और यदि संविधानकी ही दुहाई देनी है तो मन्दिर बोर्डके अधिकारियोंको मन्दिरमें नहीं किसी संवैधानिक संस्थामें होना चाहिए । धर्मके निर्णय केवल और केवल शास्त्रद्वारा ही लिए जा सकते हैं और यह निधर्मियोंको समझ नहीं आ सकता है; अतः अब मन्दिरोंको शासकीय नियन्त्रणसे मुक्ति ही इसका स्थायी समाधान है !” – सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : ऑप इण्डिया
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