न्यायव्यवस्थाके सन्दर्भमें हास्यास्पद लोकतन्त्र !


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एक ओर जलसंवर्धन हेतु शासन अनेक कोटि रुपये व्ययकर जनजागृति करता है; परन्तु अनेक कोटि प्रलम्बित प्रकरणोंमें तथा न्यायाधीशोंकी यथोचित संख्याकी न्यूनता होते हुए भी सहस्रों प्रपत्रोंके आरोपपत्र तथा तिथिपर तिथि ((तारीखपर तारीख) लेनेकी अनिष्ट पद्धतिके कारण इस न्यायतन्त्रका बहुमूल्य समय व्यर्थ होते हुए भी शासन कुछ नहीं करता । – परात्पर गुरु डॉ . जयंत आठवले



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