हमारी वैदिक संस्कृति भोगवादी नहीं है, वरन यह त्यागकी प्रवृत्तिकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन करती है । इसका यह अर्थ कदापि न समझें कि हमारे यहां ऐश्वर्य, समृद्धि, सुख-सुविधा या वैज्ञानिक आविष्कार नहीं थे । प्राचीन भारतीय संस्कृतिके बुद्धिजीवी उच्च कोटिके शोधकर्ता थे एवं उन्होंने भोग और योगमें सुन्दर सामंजस्यके सिद्धान्त प्रतिपादित किए थे, हमारे प्राचीन ज्ञान एवं दक्षिण भारतके गगनचुम्बी देवालय, प्राचीन भारतीय संस्कृतिकी वैज्ञानिक प्रभुत्वको सिद्ध करने हेतु आज भी पर्याप्त हैं ।
हमारे यहां प्रवृत्ति और निवृत्तिमार्गी अर्थात दोनोंके आदर्श त्यागी पुरुष थे; अतः भोगमें व्यक्ति, निर्लिप्त कैसे रह सके, यह धर्म सिखाता है । सन्यासी, योगी, तपस्वी त्यागकी प्रतिमूर्ति हुआ करते थे और वे ही गृहस्थोंके आदर्श भी थे । समाजका आदर्श ‘त्याग’ होनेके कारण भोगवादी प्रवृत्ति समाजमें व्याप्त नहीं थी और व्यक्ति अपने जीवनके मूल उद्देश्य अर्थात आध्यात्मिक प्रगतिको प्रधानता देते थे और इस वसुंधराके भोग भूमि नहीं अपितु साधना भूमि होनेके कारण व्यष्टि और समष्टि जीवन सुखी था । माता-पिता अपने अल्प आयुके बच्चेको उच्च संस्कार देने हेतु अपने मोहका त्यागकर उन्हें गुरुकुल भेज देते थे । राजा, राजकुमारके युवा होते ही सारा राज-पाठ उसे सौंपकर वानप्रस्थी होकर साधनारत हो जाते थे और ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थीके मार्गदर्शक आत्मज्ञानी सन्त हुआ करते थे, जो भोगी नहीं, योगी होते थे । विषयोंसे अनासक्त व्यक्ति सभी आश्रमोंके (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ) आदर्श थे, क्योंकि विषयोंके त्यागसे ही खरे आनन्दकी प्राप्ति होती है । इसलिए मनुस्मृतिमें कहा गया है –
यश्चैतान्प्राप्नु यात्सर्वान्यश्चैतान्केवालांस्त्यजेत् ।
प्रापणात्सर्वकामनां परित्यागो विशिष्यते ।।
अर्थात एक व्यक्ति सब विषयोंके भोगको प्राप्त कर ले और दूसरा व्यक्ति सब विषयोंके भोगका त्याग कर दे, उन दोनोंमें विषयोंको त्याग करनेवाला अधिक श्रेष्ठ होता है । इसका कारण यह है कि जिस व्यक्तिको विषयोंसे सम्बन्धित सामग्री उपलब्ध है, वह उनका दास बन जाता है और उसके फलस्वरूप उसका मन और शरीर उससे आसक्त होकर उनका भोग करनेमें क्षीण हो जाएगा । इसके विपरीत, जिस व्यक्तिने सब विषयोंका त्याग किया है, वह अलिप्त होनेके कारण सभी प्रकारसे शक्तियुक्त और संतुष्ट होता है ।
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