गीता सार :

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥ – श्रीमदभगवद्गीता(३:६)
अर्थ : जो मूढ बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियोंको हठपूर्वक ऊपरसे रोककर मनसे उन इन्द्रियोंके विषयोंका चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात दम्भी कहा जाता है |
भावार्थ : यह श्लोक आजके तथाकथित संतों और सन्यासियोंपर योग्य बैठता है | बाहरसे गेरुआ चोला, विशाल जटायें और बडीसी तिलक धारण कर अनेक ढोंगी साधनाका ढोंग करते हैं और उन्हें किसी भी प्रकारकी कोई आसक्ति नहीं और वे जितेंद्रिय हैं इस प्रकारका प्रदर्शन करते हैं | वस्तुतः बाह्य रूपसे सन्यासका नाटक करनेवाले सबसे अधिक अपनी ही हानि करते हैं | इंद्रियोंका दमन मात्र प्रवचन लेनेसे, गेरुआ वस्त्र धारण करनेसे या बाह्य रूपसे उससे दूरी बनानेसे नहीं होता | जब तक इंद्रियोंका पूर्ण दमन नहीं हो जाता वे कभी भी पूर्ण आवेगसे भिन्न-भिन्न वासना या षडरिपुके माध्यमसे प्रकट हो सकती हैं | इंद्रियोंके पूर्ण नियंत्रण हेतु मनोलय होना परम आवश्यक, मन ही मोक्ष एवं बंधनका कारण है और इंद्रियोंका मुख्य कार्यक्षेत्र है, अतः इंद्रियोंके नियंत्रण हेतु प्रथमतः प्रत्याहार (अर्थात जो वस्तुसे मन विचलित हो उससे मनको दूर रखना ) करना चाहिए | तत्पश्चात एकांतमें बैठकर कौन सी विषय–वासनाका प्राबल्य अधिक है इसका अभ्यास करना चाहिए और विवेकका उपयोग कर उस वासनापर मात पाने हेतु अखंड प्रयास करने चाहिए | जब भोगके वस्तु हों और मन योगमें लगने लगे तो समझें खरे अर्थमें इंद्रियोंपर नियंत्रण होना आरंभ हो गया | जितना अधिक मनके विरुद्ध जाएंगे उतना ही अधिक मनका विलिनीकरण होने लगता है, यह मूलभूत सिद्धान्त ध्यान रख साधकने आचरण करना चाहिए अन्यथा मन एवं वासना कभी भी नियंत्रित नहीं हो सकता है-तनुजा ठाकुर
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