माता -पिताके मध्य अवरोधकी जड बना रहा है ‘स्मार्टफोन’, ३०% लोग ‘मृगमरीचिका ध्वनि’के रोगसे ग्रस्त !


जून ११, २०१८

‘स्मार्टफोन’हमारे जीवनका अभिन्न अंग बनता जा रहा है । कुछ लोगोंका तो पूरा दिवस ही चलभाषके आश्रयपर ही जाता है । इसकी आवश्यकता अब   धीरे -धीरे रोगमें बदल रही है । ‘स्मार्टफोन’का बहुत अधिक प्रयोग उपयोगकी अन्य वस्तुओंके दुरुपयोग और व्यसनके समान है । जो लोग चलभाषका अधिक उपयोग करते हैं, वे बहुत अलग -थलग महसूस करते हैं । ऐसे लोग अकेलापन, उदासी और चिन्ता महसूस करते हैं । इतना ही नहीं आजकल यह कुटुम्बोंमें झगडेका मूल भी बन रहा है ।
एक अध्ययनमें इस बात संज्ञानमें आई है । अध्ययनके अनुसार, जो लोग ‘स्मार्टफोन’का अधिक उपयोग करते हैं, वे निरन्तर गतिविधियोंके मध्य चलभाषमें लुप्त हो जाते हैं और अपना ध्यान केन्द्रित नहीं रख पाते हैं । चलभाषके सही उपयोगके बारेमें जागरुकता पैदा करनेकी आवश्यकता है कि इस तरहकी लत हमें मानसिक रूपसे थका देती है और आराम नहीं करने देती ।

‘हार्ट केयर फाउण्डेशनडेशन’के (एचसीएफआई) अध्यक्ष डॉ. केके अग्रवालने कहा, “हमारे चलभाष और संगणकपर आने वाली अधिसूचना (नोटिफिकेशन), कम्पन और अन्य सूचना हमें निरन्तर पटलकी (स्क्रीन) ओर देखनेके लिए विवश करते हैं । शोधके अनुसार, यह सतर्कता कुछ वैसी ही प्रतिक्रियाका परिणाम है जैसा कि किसी संकटके समय या आक्रमणके समय प्रतीत होता है ।”

उन्होंने कहा, “इसका अर्थ यह है कि हमारा मस्तिष्क निरन्तर सक्रिय और सतर्क रहता है, जोकि इसकी स्वस्थ कार्य प्रणालीके अनुरूप नहीं है । हम निरन्तर उस गतिविधिकी खोज करते हैं और उसकी अनुपस्थितिमें बेचैन, उत्तेजित और अकेलापन प्रतीत होता है ।”

डॉ. अग्रवालने कहा, “यदि हमें ३० मिनटतक कोई सन्देश प्राप्त न हो तो चिन्ता होने लगती है । ३० प्रतिशत मोबाइल उपयोगकर्ताओंमें यह समस्या होती है । मृग-मरीचिका सन्देश (फैण्टम रिंगिंग) २० से ३० प्रतिशत मोबाइल उपयोगकर्ताओंमें होती है । आपको ऐसा प्रतीत होता है कि आपका चलभाष कम्पन कर रहा है और आप बार -बार उसे देखते हैं; जबकि ऐसा सचमें होता नहीं है ।”

अध्ययनके अनुसार, प्रसार वाहन (सोशल मीडिया) प्रौद्योगिकीकी लत सामाजिक जीवनपर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है । इसकेद्वारा होने वाला संचार आधा -अधूरा होता है और इसे आमने -सामनेके संचारका विकल्प नहीं माना जा सकता । इसमें शरीरकी भाषा और अन्य रिश्तोंकी संवेदनाका अभाव होता है ।

अध्ययनमें कहा गया है, “३० प्रतिशत प्रकरणमें ‘स्मार्टफोन’ माता–पिताके मध्य झगडेका कारण भी बनता है । चलभाष अधिक प्रयोग करने वाले बच्चे देरीसे उठते हैं और विद्यालय जानेके लिए तैयार नहीं होते हैं । लोग सोनेसे पूर्व ‘स्मार्टफोन’के साथ बिस्तरमें ३० से ६० मिनट रहते हैं ।”

डॉ. अग्रवालने बताया, “इनके माध्यमसे सूचना प्राप्त करनेके कारण मस्तिष्कके ‘ग्रे मैटर’में अल्पता आती है, जोकि संज्ञान और भावनात्मक नियन्त्रणके लिए उत्तरदायी होता है । इस विज्ञान कालमें, अच्छे स्वास्थ्यकी कुञ्जी है, संयम । हममें से अधिकांश लोग ऐसे उपकरणोंके दास बन गए हैं, जो वास्तवमें हमें स्वतन्त्रता प्रदान करनेके लिए थे और हमें जीवनका अनुभव प्रदान करने और लोगोंके साथ रहने हेतु अधिक समय देनेके लिए बनाए गए थे । हम अपने बच्चोंको भी उसी गलत रास्तेपर ले जा रहे हैं ।’’

डॉ. अग्रवालने इससे बचावका सुझाव देते हुए कहा, ” ‘इलेक्ट्रॉनिक कर्फ्यू’का अर्थ है, सोनेसे ३० मिनट पूर्व किसी भी उपकरणका उपयोग न करना । हर तीन माहमें सात दिनोंके लिए ‘फेसबुक’से अवकाश लें ! सप्ताहमें एक बार पूरे दिन सामाजिक प्रसार वाहनके प्रयोगसे बचें ! चलभाषका उपयोग केवल आवश्यक बात करनेके लिए करें ! दिनमें तीन घण्टेसे अधिक समयतक संगणकका उपयोग न करें !”

‘फैंटम रिंगिंग’ वह अवस्था है जब बिना ध्वनिके भी लोगोंको लगता है कि उनका चलभाष बज रहा है और वे बार -बार देखते रहते हैं । चलभाषकी जांच करते रहना लोगोंकी लत बन गई है ।

स्रोत : दैनिक जागरण



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