शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥ – श्री मदभगवद्गीता (५:२३)
अर्थ : जो साधक इस मनुष्य शरीरमें, शरीरका नाश होनेसे पहले-पहले ही काम-क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले वेगको सहन करनेमें समर्थ हो जाता है, वही पुरुष योगी है और वही सुखी है |
भावार्थ : जब तक यह शरीर है इंद्रियां अपनी प्रकृति अनुरूप कार्यरत रहती ही हैं | साधक अपनी साधनाके बल एवं विवेकद्वारा उन इंद्रियोंसे उत्पन्न संवेदनाको नियंत्रित कर उसे योग्य दिशा देता है और तभी वह जितेंद्रिय कहलाता है |
जैसे जिह्वाका कार्य है बोलनेमें सहायता करना एवं स्वादकी अनुभूति लेना । एक साधक अपनी वाचालताका नियंत्रण कर जितना आवश्यक है उतना ही बोलता है और जब बोलता है तो भगवद स्तुति या उनसे संबन्धित कार्यके संबंधमें ही यदि बोलता है तो उसे उस इंद्रियका सदुपयोग भी होता है और वाणीका शुद्धिकरण होकर अंतर्मुखता साध्य होती है परिणामस्वरूप उस इंद्रियके कार्यके वेगको भविष्यमें अपनी इच्छा अनुकूल नियंत्रित किया जा सकता है अर्थात कहां कितना बोलना है यह भान होने लगता है, व्यवहारकी अनेक समस्या हमारी वाचालताके कारण निर्माण होती है, इसकी अनुभूति अनेकोंने ली होगी | इसी प्रकार नेत्र योग्य ही देखेँ, ऐसे ध्येय बना लें तो अयोग्य दृश्यके दिखाई देनेपर या उसके विचार आनेपर या तो उस दृश्यसे आप नेत्र नेत्र हटा लेंगे या झुका लेंगे या मनमें कोई सात्त्विक भाव उत्पन्न कर उस दृशयसे मनको योग्य दिशा दे देंगे, तो नेत्रके माध्यमसे मनमें जो भी विषय वासनाके संस्कार जागृत होंगे वह प्रत्याहारके कारण नियंत्रित हो जाएंगे | इंद्रियां स्वतंत्र रूपसे हमारा अनिष्ट नहीं कर सकती हैं, विषय वासनाके प्रति आसक्ति ही इंद्रियोंको अयोग्य दिशामें जानेकी अनुमति देकर मनुष्यमें देवत्वका ह्रास करती है अतः अपने बुद्धिद्वारा अपने मनको योग्य दिशा देना चाहिए क्योंकि इंद्रियोंको दिशा निर्देश मनसे आते हैं | जैसे किसीको मधुमेह हो और उसे मिठाई ग्रहण करने की इच्छा हो तो सर्वप्रथम मिठाई ग्रहण करना यह विचार मनमें उत्पन्न होता है और मिठाई ग्रहण करनेके पश्चात, जिह्वामें उसके स्वादसे जो अनुभूति प्राप्त होती है उससे मनको क्षणिक सुखकी अनुभूति होती है जो उस व्यक्तिके शारीरिक स्वास्थ्यके दृष्टिसे घातक है | एक साधक जिसने मन एवं इंद्रियोंका अभ्यास किया है वह मनद्वारा प्राप्त मिठाई ग्रहण करनेकी संवेदनाको अपने विवेकके माध्यमसे नियंत्रित करेगा और जब इस प्रकार वह प्रत्येक बार भिन्न परिस्थितियोंमें इंद्रियोंको नियंत्रित करनेमें यशस्वी हो जाएगा उसे ही योगी कहते हैं |
-तनुजा ठाकुर
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