जनवरी २३, २०१९
उच्चतम न्यायालयने एक महत्वपूर्ण निर्णयमें कहा है कि मुस्लिम पुरुष और हिन्दू महिलासे उत्पन्न सन्तान पिताकी सम्पत्तिमें भागीदार होगा, ऐसा बच्चा सम्पत्तिमें अधिकारी होगा ।
न्यायाधीश एनवी रमण और एमएम शांतनागौडरने मंगलवार, २२ जनवरीको एक निर्णयमें यह व्यवस्था देते हुए कहा कि मुस्लिम व्यक्तिका विवाह मूर्तिपूजक या अग्निपूजकसे होना न तो वैध (उचित) है और न ही अवैध (बातिल) है, वरन यह अनियमित विवाह (फासिद) है । इस विवाहसे उत्पन्न सन्तान पिताकी सम्पत्तिका अधिकारी होगा । केवल ‘बातिल विवाह’से उत्पन्न संतान ही अवैध मानी जाएगी ।
प्रकरण तब आरम्भ हुआ, जब इस विवाहसे उत्पन्न सन्तान शमसुदीनने पिताकी मृत्युके पश्चात पारिवारिक सम्पत्तिमें भाग मांगा । अन्य परिजनोंने उसे अवैध बताया और कहा कि वह हिन्दू महिलासे हुए विवाहसे उत्पन्न हुआ है, जो बातिल विवाह है ।
यह प्रकरण पहले ‘ट्रायल कोर्ट’में तत्पश्चात उच्च न्यायालयमें आया । ‘ट्रायल कोर्ट’ने विवाहको उचित माना और भाग देनेका आदेश दिया; परन्तु परिजन प्रकरण उच्च न्यायालयमें ले गए । उन्होंने कहा कि वैलियम्मा धर्मसे हिन्दू थी और इस कारण पति इलियासकी सम्पत्तिमें कोई भाग नहीं होगा; इसलिए पुत्रको भी कोई भाग नहीं दिया जाएगा; परन्तु केरल उच्च न्यायालयने मुस्लिम विधानका सन्दर्भ देते हुए कहा कि विवाह ‘फासिद’ है, ‘बातिल’ नहीं; इसलिए बच्चेको भाग देना पडेगा । इसके पश्चात प्रकरण उच्चतम न्यायालय पहुंचा । शीर्ष न्यायालयने भी उच्च न्यायालयका निर्णय बनाए रखा ।
“ऐसे तो हिन्दू महिलाका मुस्लिमसे विवाह अपने जीवनको नष्ट करनेके समान है; परन्तु यदि कोई हिन्दू महिला इस जालमें फंस ही चुकी है और मुस्लिम परिवार महिलाके पुत्र सम्पत्ति नहीं देना चाहता है; क्योंकि वह हिन्दू महिलाके गर्भसे जन्मा है, तो फिर मुस्लिमोंको हिन्दू महिलासे विवाह भी नहीं करना चाहिए और यदि विवाह किया है तो वह सम्पत्तिका समान अधिकारी है, यही विधान है ।”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : न्यूज १८
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