जैसे एक घडेमें बहुतसे छिद्र हों और हम उसमें जल डालते जाएं तो जल कभी भी एकत्रित नहीं होगा, उसी प्रकार नामजप, सत्सेवा, त्याग, इत्यादि करनेसे जो आध्यात्मिक ऊर्जा एकत्रित होती है, वह दोषोंके कारण निर्माण होनेवाले पापकर्मके क्षालनमें नष्ट हो जाती है । इसलिए महाभारतमें कहा गया है –
पञ्चेंद्रियस्य मर्त्यस्य छिद्रं चेदेकमिंद्रियम् ।ततोऽस्य स्रवति प्रज्ञा दृतेः पात्रादिवोदकम् ॥ – महाभारत, उद्योगपर्व
अर्थ : मनुष्यकी पञ्च ज्ञानेन्द्रियां होती हैं, इसमेंसे एक भी इन्द्रियपर नियन्त्रण न हो तो सारा ज्ञान वैसे ही निकल जाता है जैसे एक छिद्रवाले पात्रसे सर्व जल निकल जाता है । अर्थात इन्द्रियोंपर नियन्त्रण न हो तो सारा ज्ञान, साधना, तप सब व्यर्थ हो जाता है; क्योंकि इन्द्रियोंकी वासना, सबपर भारी पडती है।साधनाके प्रयासोंसे एकत्रित आध्यात्मिक शक्ति, साधककी कुण्डलिनीमें स्थित सूक्ष्म चक्रोंके भेदनमें स्वतः ही उपयोग होती है; किन्तु जैसे यदि एक साधक प्रतिदिन ग्यारह माला जप करता है और कोई भी विपरीत प्रसंग होनेपर किसीको तीन अपशब्द कहता है तो उसकी पन्द्रह माला जपकी शक्ति नष्ट हो जाती है । अर्थात दोषोंके कारण, साधनामें वृद्धि होनेकी अपेक्षा उससे निर्माण हुए पापकर्मको नष्ट करनेमें साधनाकी शक्ति क्षीण होती है एवं प्रतिदिन चूकें अधिक हों तो साधनामें अधोगति होती है । अब आपको समझमें आ रहा होगा कि बहुत साधना करनेपर भी अनेक साधकोंपर ईश्वरीय कृपाका संचार क्यों नहीं होता है ?
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