
एक साधकसे वार्तालापके मध्य जब मैंने पूछा कि आपका आध्यात्मिक स्तर पचास प्रतिशत है और आपको योग्य साधना ज्ञात है तो भी आप कर्मकांड अंतर्गत उपवास इत्यादि क्यों रखते हैं, तो वे कहने लगे, “मैं वस्तुतः अपने भार(वजन) घटाने हेतु नवरात्रिका व्रत रखता हूं ” ! साधकों ! मां दुर्गाके व्रतके प्रति ऐसा अयोग्य दृष्टिकोण रख महापापके भागी न बनें ! भार(वजन) ही घटाना है, तो सैर करें, शारीरिक श्रमवाली सेवाओंमें अपने घरमें हाथ बटाएं, भोजन करते समय अपने जिह्वापर नियंत्रण रखें, तैलीय एवं मीठे पदार्थका सेवन न करें, अंकुरित अन्न, हरी सब्जी, फल इत्यादि लें; परन्तु मैं नवरात्रिका व्रत भार(वजन) घटाने हेतु करूंगा या करता हूं, यह अयोग्य दृष्टिकोण न रखें ! नवरात्रिका व्रत अत्यधिक कठिन होता है, यदि उसके एक भी नियम भंग हो गए तो नवरात्रिके व्रतका लाभ नहीं मिलता | यदि व्रतधारी पुरुष हो तो व्रतके समय मनसा, वाचा, कर्मणा, अपने इन्द्रियोंपर पूर्ण नियंत्रण रखना होता है, दाढी नहीं बनानी होती है, नीचे भूमिपर सोना होता है, कहीं भी बाहर जाना मना होता है, दुर्गा सप्तशतीका पाठ योग्य उच्चारणके साथ पूर्ण कर ही आहार ग्रहण करना होता है, ब्रह्मचर्यका पालन करना होता है, ऐसे ही अनेक कठोर नियमोंका शब्दश: पालन करना होता है, इनमेंसे एक भी नियमका पालन टूटनेपर व्रतका लाभ नहीं होता, इसके विपरीत कठोर प्रायश्चित लेना पडता है, इसलिए कलियुगमें योग्य साधना नामजप है और आध्यात्मिक स्तर पैंतालिस प्रतिशतसे अधिक हो तो नवरात्रिके कालमें नामजपके साथ ही धर्मप्रसारकी साधना करना चाहिए, इससे मां दुर्गाकी सर्वाधिक कृपा आप अर्जित कर पायेंगे ! -तनुजा ठाकुर (२५.३.२०१५)