मेरे पिताजीने मुझमें आठवीं कक्षासे ही समाचार पत्र पढनेकी वृत्ति निर्माण की थी ! श्रीगुरुसे जुडनेपर मैंने डेढ वर्षतक इसे पढना छोड दिया था ! मुझे लगा था कि अब अध्याममें प्रगति करनी है तो मायासे सम्बन्धित इस समाचारोंको पढकर समय क्यों व्यर्थ करना ! किन्तु डेढ वर्ष पश्चात मेरे सर्वज्ञ श्रीगुरुने मुझसे कहा कि आप समाचार पत्र पढना पुनः आरम्भ करें, इससे समाजको दृष्टिकोण देनेमें सहायता मिलेगी ! तबसे नियमित समाचार पत्र पढती हूं; किन्तु उसे पढनेपर मन अशांत हो जाता है ! देश और समाजकी क्या दुर्दशा हो रही है ?, हम कहां जा रहे हैं ?, इसपर इस देशके शासनकर्ताओंंका जैसे ध्यान ही नहीं है, सब मात्र अपनी सत्ता बचानेमें लगे हैं ! अरे मूढों ! देश होगा तो ही राज्य करोगे न ! जब देश ही नहीं रहेगा तो क्या वनमें जाकर पशुओंके समक्ष अपने राजा होनेके अहंकारका प्रदर्शन करोगे ! देश है तो सब है; इसलिए पहले देशसे सभी कंटकोंका समूल नाश करो !
Leave a Reply