पुरी जगन्नाथ मन्दिरकी अचल सम्पत्ति विक्रय कर सकेंगे अधिकारी, भाडेपर भी देनेका होगा अधिकार


०६ जनवरी, २०२२
ओडिशा मन्त्रिमण्डलने (कैबिनेटने) बुधवारको निर्णय लेते हुए पुरी स्थित श्रीजगन्नाथ मन्दिर अधिनियम-१९५४ में संशोधन प्रस्तावको स्वीकृति दे दी है । इसके साथ ही शासकीय अधिकारियोंको पुरी जगन्नाथ मन्दिर संचालन समितिके अधीनकी भूमि व अन्य अचल सम्पत्तिको विक्रय या भाडेपर देनेका अधिकार मिल गया है । मुख्य सचिव सुरेश चंद्र महापात्रने मुख्यमन्त्री नवीन पटनायककी अध्यक्षतामें ‘वीडियो कांफ्रेंसिंग’के माध्यमसे आयोजित वर्ष २०२२ की ‘कैबिनेट’की प्रथम बैठकमें लिए गए निर्णयोंकी जानकारी दी । मुख्य सचिवने बताया कि श्रीजगन्नाथ मन्दिर अधिनियम १९५४ की धारा १६-२ के अनुसार, श्रीजगन्नाथ मन्दिरकी अचल सम्पत्तिको विक्रय, ‘लीज’पर देने या ‘गिरवी’ रखते समय स्वामित्वका अधिकार स्थानान्तरणके लिए प्रथम शासनसे अनुमोदनकी आवश्यकता रहती थी ।
‘कैबिनेट’के इस निर्णयके पश्चात अब इसकी बाध्यता नहीं रहेगी । मन्दिरके कार्यकारी अध्यक्ष, मुख्य प्रशासक, मन्दिर प्रशासक, उप प्रशासक आदि अधिकारी अब सम्बन्धित सम्पत्तिको विक्रय अथवा ‘गिरवी’ रखनेके विषयमें निर्णय ले सकेंगे ।
विचारणीय है कि, महाप्रभु श्रीजगन्नाथके मन्दिरके सेवायतोंको निःशुल्क घर उपलब्ध कराया जाएगा । इसके लिए आठ एकड भूमि देख ली गई है और समूचा व्यय ओडिशा शासन वहन करेगा । पुरी जगन्नाथ मन्दिर प्रबन्ध समितिकी बैठकके पश्चात मन्दिरके मुख्य प्रशासक कृष्ण कुमारने यह जानकारी देते हुए कहा था कि एक ‘श्रीमन्दिर गुरुकुल’ स्थापित किया जाएगा । कुमारने कहा कि गुरुकुलको १७ एकडके भूखण्डपर स्थापित किया जाएगा और ओडिशा शासन इसकी स्थापनाका समूचा व्यय वहन करेगा । एक श्रीमन्दिर आदर्श गुरुकुल संस्था बनाई जाएगी, जो गुरुकुल चलाएगी । उन्होंने बताया कि प्रथम गुरुकुलकी स्थापनाके लिए सर्वोच्च न्यायालयसे कुछ धनराशि हमें मिली थी । इसका उपयोग इस उद्देश्यके लिए किया जाएगा ।
       जिस प्रकारसे गुरुकुल स्थापना और सेवायतोंको घर देनेका निर्णय ओडिशा शासनने लिया है, इससे आभास होता है कि ओडिशा शासनकी मंशा हिन्दू संस्कृतिके लिए सकारात्मक है; परन्तु अधिकारियोंको मन्दिरके हितके विरुद्ध निर्णय लेनेसे रोकने हेतु मन्दिरके विश्वस्तोंको अधिकार होना चाहिए । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
 
 
साभार : हिन्दू जन जागृति समीति


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