पाण्डित्य दर्शानेवालोंका मात्र पुस्तकरूपी होना !


पुस्तकमें शाब्दिक ज्ञान होता है ।इसका ज्ञान पुस्तकको स्वयंको नहीं होता ।उसीप्रकार पाण्डित्यका प्रदर्शन करनेवाले व्यक्ति, जिन्हें शाब्दिक ज्ञान होता है, उन्हें उस ज्ञानकी अनुभूति नहीं होती है । – परात्पर गुरु डॉ . जयंत आठवले

 



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