पाश्चात्य देशोंमें गायन तथा नृत्य केवल सुखप्राप्ति हेतु किए जाते हैं । इसके विपरीत भारतमें संगीत एवं नृत्य साधनाकी पद्धति होनेसे ६४ कलाओंके अन्तर्गत आते हैं; अतः संगीत एवं नृत्य साधनामें ध्यानके समान स्थिर न बैठकर भी अर्थात गाते तथा नृत्य करते हुए ध्यान लगता है । भक्तिगीत गायनमें अथवा उसके साथ साथ नृत्य करते हुए भावजागृति भी होती है । – परात्पर गुरु डॉ जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था
साभार : मराठी दैनिक सनातन प्रभात (https://sanatanprabhat.org)
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