आज अधिकांश पुरुषोंका मुख्य ध्येय होता है – स्त्री सुख पाना और धन कमाना । चार पुरुषार्थमें धर्म और मोक्षको आज अधिकांश पुरुष कोई महत्व नहीं देते हैं एवं अर्थ और कामकी पूर्ति भी धर्मके आधारपर नहीं करते हैं; अतः अनेक बार पत्नीद्वारा साधना करनेपर उनके अहंको ठेस पहुंचती है, विशेषकर यदि पत्नी समष्टि साधनामें रुचि लेते हुए आगे बढनेका प्रयास करती हों तो, अनेक पुरुष अपने ‘पति-धर्म’का निर्वाह करने हेतु अपनी अर्धांगिनीका विरोध करना आरम्भ कर देते हैं । जी हां, कलियुगी एवं तमोगुणी पुरुष, धर्म और साधनासे कोसों दूर होनेके कारण उनमें अहंका प्रमाण अधिक होता है, ऐसेमें पत्नीद्वारा योग्य साधना करनेपर वे उसका विरोध करना अपना नैतिक अधिकार समझते हैं !
ऐसेमें पत्नीने प्रथम अपनी व्यष्टि साधना बढानेका प्रयास करना चाहिए और आगे-आगे समष्टि साधना भी करनेका प्रयास करना चाहिए ! साथ ही आज ८०% पुरुषोंको योग्य प्रकारसे धर्माचरण एवं साधना नहीं करनेके कारण एवं अधिक अहं होनेके अनिष्ट शक्तियोंका कष्ट होता है, ऐसेमें घरमें कोई भी साधना करे तो अनिष्ट शक्तियां उनके माध्यमसे साधना करनेवालोंका विरोध करती हैं और पत्नीपर तो अधिक अधिकार चलता है; इसलिए उसकी प्रत्येक कृतिपर अपना नियन्त्रण रखनेको ही पुरुषत्व समझते हैं ! यदि स्थिति ऐसी हो तो पत्नीने छुपकर व्यष्टि और समाष्टि साधना की तो भी वह अधर्म नहीं होता, मैंने अपने अनेक वर्षोके प्रसार कालमें अधिकांश पतियोंको प्रथमत: साधनामें अपनी पत्नीका विरोधक ही पाया है और जब पत्नी छुपकर योग्य प्रकारसे साधना करती रहती हैं तो वही पति कुछ काल उपरान्त साधनामें, सेवामें क्रियाशील होकर, पत्नीसे भी अधिक कुशलतासे साधना करने लगता है; अतः कलियुगी पतियोंके विरोधसे न डरकर, स्त्रियोंने डटकर साधना करना चाहिए; क्योंकि इससे ही उनका एवं उनके पति दोनोंका ही कल्याण होता है ! ऐसे बहुतसे विरोधक पति जो अब साधक बन चुके हैं, वे मेरे इस कूटनीतिपर निश्चित हंस रहे होंगे; परन्तु विश्वास माने, मेरा और आपकी पत्नी दोनोंका हेतु शुद्ध था कि भी आप अनिष्ट शक्तियोंके कष्टसे मुक्त हों और ब्रह्मानन्दके रसको चख सकें ! ऐसे साधना विरोधक पति जो अब साधक बन चुके हैं, उन्हें अपनी पत्नीके प्रति सदैव ही कृतज्ञ रहना चाहिए और पत्नीको भी अभिमान नहीं करना चाहिए; क्योंकि हमारे धर्मज्ञोंने पत्नीको ‘धर्मपत्नी’ कहा है अर्थात जो अनुगामिनी स्त्री, पुरुषको धर्मके मार्गपर प्रवृत्त करे एवं साधना तथा धर्ममें कभी उनके अवरोधक न बनें वह ‘धर्मपत्नी’ कहलानेकी अधिकारिणी होती हैं ! अतः स्त्रियों आपने मात्र शास्त्रोक्त धर्मका पालन किया है और ईश्वरने आपसे करवा कर ले किया इस हेतु उन्हें कृतज्ञता व्यक्त करें !