शंका समाधान
श्री नीरज मिश्रने (मिश्रा लिखना भाषाकी दृष्टिसे अयोग्य है, यह अंग्रेजोंके कालसे आरम्भ हुआ; क्योंकि अंग्रेजीमें मिश्रको Mishra लिखा जाता है) कल प्रसारित किए गए सत्संगके सन्दर्भमें, जिसका विषय था, यदि घरमें बडे भाई पितरोंका श्राद्ध करते हों तो छोटे भाइयोंको क्या करना चाहिए ?, एक प्रश्न पूछा है, जो इसप्रकार है -
मैं इन सबपर अर्थात धर्म आदिपर बहुत विश्वास करता हूं और मुझे लगता है कि मेरे घरमें पितृदोष बहुत है; परन्तु मेरे बडे भाई, जो मेरे पिताजीका श्राद्ध करते हैं, वे इन सबपर विश्वास नहीं करते और सब कुछ देर-सवेर नाममात्रका अर्थात करना चाहिए, इसलिए करते हैं और इसी कारणसे हमारा कोई कार्य भी नहीं हो पा रहा है, कृपया मार्गदर्शन करें ।


इस प्रश्नके उत्तरसे समष्टिको भी लाभ होगा इसलिए इसे ले रही हूं –

मेरे आध्यात्मिक शोधके अनुसार, आज सबसे अधिक प्रमाणमें पितृदोष जन्म-ब्राह्मणों, उसके पश्चात जन्म-क्षत्रियों एवं तत्पश्चात ऐसे लोगोंको है जो मृत्यु उपरान्तकी यात्राको नहीं मानते हैं । जन्म-ब्राह्मण, अपने वर्ण-धर्मका शास्त्रोक्त पालन नहीं करते हैं, इस मुख्य कारणसे चार-पांच पीढियोंसे उनके यहां पितृदोष होता है या जिनके यहां एक दो पीढियोंतक उनके कुलके सदस्य वर्ण-धर्मका पालन करते थे और उनकी वर्तमान या उससे पूर्वकी पीढी अज्ञानता या आधुनिक बननेके क्रममें अपने वर्ण-धर्मका पालन नहीं किया या करते हैं तो उनके अतृप्त पितर  कुपित होकर शापित करते हैं; इसलिए आजकल जन्म ब्राह्मणोंके घर अत्यधिक पितृदोष होता है ! पितृदोष एक ऐसी समस्या है जो वंशानुगत हो जाती है एवं इसकी तीव्रता यदि योग्य उपाय न किया जाए तो प्रत्येक पीढीमें क्रमश: बढती जाती है । जैसे यदि पति-पत्नीमें बहुत अधिक मतभेद हो या लडाई होती हो तो ऐसी सम्भावना है कि उनके घरके बडे सन्तानको वैवाहिक सुख न मिले !

  आज अनेक जन्म-ब्राहमण, उपनयन संस्कार उपरान्त जनेऊ भी नहीं पहनते हैं; इसलिए उनके अधिकतर देव और पितृकर्म विफल हो जाते हैं ! साथ ही वे मांस-मदिराका सेवन करते हैं और योग्य साधना भी नहीं करते हैं; इसलिए उनके कुलोंमें पितृदोषका प्रमाण बहुत अधिक है ! घरके मुखिया या जयेष्ठ भ्राताका धर्म या अध्यात्मपर अधिक विश्वास न होना या उसके अनुरूप ठीकसे श्रद्धापूर्वक धर्मपालन न करनेके पीछे दो मुख्य कारण होते हैं, एक या तो उन्हें इसका ज्ञान नहीं होता और दूसरा कारण सूक्ष्म होता है, यदि घरमें पितृदोषका प्रमाण अधिक होता है तो कुपित अतृप्त पूर्वज घरके मुखिया या ज्येष्ठ पुत्रको सबसे पहले कष्ट देते हैं, ये कष्ट शारीरिक, मानसिक, आर्थिक या कौटुम्बिक हो सकते हैं, कष्टकी तीव्रता बढाने हेतु वे उनका बुद्धिभ्रम करते हैं अर्थात मन एवं बुद्धिपर सूक्ष्म काला आवरण निर्माण कर देते हैं, जिस कारण वे ठीकसे साधना या धर्मपालन भी नहीं कर पाते हैं, ऐसा वे प्रतिशोधकी भावनासे करते हैं; क्योंकि ऐसे लोग पितरोंकी इच्छा अनुरूप समयसे उन्हें गति देने हेतु योग्य उपाय योजना नहीं करते हैं ! अतृप्त पितरोंद्वारा मन और बुद्धिपर सूक्ष्म काला आवरण निर्माण करनेसे ऐसे सदस्योंको और अधिक कष्ट होता है, यह अनिष्ट योनिमें वास कर रहे पूर्वजोंको या जो मान्त्रिक उन्हें कष्ट देते हैं, उन्हें अच्छा लगता है  !

ऐसी स्थितिमें क्या करना चाहिए ?, यह इस सत्संगमें संक्षेपमें बताया जा चुका है तथापि एक बार पुनः बता देती हूं । यदि पिता, बडे भ्राता धर्मभ्रष्ट हो गये हैं या धर्मपालन नहीं करते हों तो घरका कोई भी अन्य सदस्य सर्व पितृकर्म श्रद्धापूर्वक कर सकता है, इसकी अनुमति हमारे धर्मशास्त्र देते हैं ।

   श्राद्ध शब्दकी व्युत्पत्ति ही श्रद्धा शब्दसे हुई है, ऐसेमें यदि कोई व्यक्ति इसे श्रद्धासे नहीं करता है तो उसका यथोचित लाभ उसे नहीं मिलता है ! कर्मकाण्ड अनुसार, पितृशान्ति हेतु सर्व कृत्य करनेके साथ ही ‘श्री गुरुदेव दत्त’का जप कष्टकी तीव्रता अनुरूप दो से छ: घंटे प्रतिदिन कष्टकी तीव्रता न्यून होनेतक करें ! साथ ही किसी सन्तकार्यसे जुडकर सत्सेवा करें, आपको एक पूर्वजको गति देनेमें अनेक वर्ष लग सकते हैं; किन्तु वही कार्य सन्त कुछ ही क्षणोंमें कर सकते हैं; किन्तु सन्त ऐसे ही अपनी कृपा नहीं बरसाते, इस हेतु उनके मनमें जो है वैसी साधना और सेवा करनी चाहिए और उन्हें प्रसन्न करनेका प्रयास करना चाहिए ! विशेषकर जन्म ब्राह्मणोंके घरके अतृप्त पूर्वज शक्तिशाली अनिष्ट योनिमें रहते हैं, जिसे कोई सन्त सरलतासे गति दे सकते हैं; क्योंकि कर्मकाण्डमें की जानेवाली विधियोंको आज लोग ठीकसे करते नहीं हैं और साथ ही सात्त्विक एवं ६० % से अधिक आध्यात्मिक स्तरवाले श्राद्धविधि करानेवाले ब्राह्मणोंकी भी आज बहुत अधिक न्यूनता है ! ध्यान रहे, यदि अतृप्त पूर्वज ब्रह्म-पिशाच या ब्रह्म-राक्षस योनिमें हों तो उन्हें सात्त्विक पुरोहित और योग्य श्राद्धविधिके अभावमें गति देना बहुत कठिन होता है ! मैंने अनेक बार पाया है कि जन्म-ब्राह्मणोंके अनेक पूर्वज ऐसे अनिष्ट योनिमें होते हैं ! इसके पीछे उनका अहंकार एवं योग्य साधना न करना तथा अधर्म करना होता है । इसलिए सभी सात्त्विक जीवात्माओंने अपने अहं और दोषपर ध्यान देना चाहिए जिससे मृत्यु उपरान्त वे अटकें नहीं और अपने वंशजोंको कष्ट न दें ।



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सम्बन्धित लेख


विडियो

© 2021. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution