गीता सार


यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌ ॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌ ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ – श्रीमदभगवद गीता ४:७,८

अर्थ : हे भारत ! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूपको रचता हूं अर्थात साकार रूपसे सबके सम्मुख प्रकट होता हूं ॥7॥

साधु पुरुषोंका उद्धार करनेके लिए, पाप कर्म करनेवालोंका विनाश करनेके लिए और धर्मकी अच्छी तरहसे स्थापना करनेके लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूं ॥8॥
भावार्थ : वैदिक सनातन धर्म स्वयंभू है अर्थात ईश्वर निर्मित है अतः जब जब धर्मग्लानि होती है ईश्वर जो उसके संरक्षक है वे अवतरित होकर धर्म संस्थापनाका कार्य करते हैं और इतिहास इसका साक्षी है अतः यह आदि काल से चला आ रहा हा और अनादि काल तक चलेगा | अवतारोंका मुख्य कार्य दुर्जनोंका संहार होता है | वैसे तो ईश्वर निर्गुण है और जब दुर्जनोंकी संख्या और उपद्रव बढ जाते हैं तो निर्गुण ईश्वर भी उन्हें दंड देनेमें सक्षम है तब भी ईश्वर स्वयं भिन्न रूपोंमें आकार धर्म रक्षण एवं भक्तका रक्षण करते हैं जिससे कि दुर्जनोंको यह भय रहे कि अधर्म करनेपर उन्हें दंड दिया जाएगा | परंतु अहंकारकी आवेशमें दुर्जन यह सब भूलकर कुकृत्य करता ही जाता है और जब उसके पाप का घडा भर जाता है तब ईश्वर धर्म रक्षणार्थ अवतरित होते हैं और उसका ही नहीं उस दुर्जनके साथ देनेवाले और मूक रूपमें उसकी दुर्जनताको सहन करनेवालेका भी नाश करते है | भगवान श्री कृष्णने स्पष्ट रूपसे कहा है ‘परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌’ अर्थात साधकोंका रक्षण कर एवं दुर्जनोंका विनाश कर वे धर्म संस्थापन करते हैं | उन्होंने यह नहीं कहा है वे सज्जनोंका रक्षण करेंगे, उन्होंने कहा वे ‘साधूनां’ अर्थात साधनारत जीवोंका रक्षण करेंगे | ‘सज्जन’ जो यह कहते फिरते हैं मैं किसीका बुरा नहीं करता और किसीका बुरा नहीं सोचता उनपर ईश्वरीय कृपा नहीं होती, व्यक्तिका साधक होना आवश्यक है तभी वह ईश्वरीय कृपाका पात्र बन सकता है | ईश्वरीय विधान अनुसार जो अच्छा करता है उसे पुण्य और जो बुरा करता है उसे पाप मिलता है और उसे अनुसार कर्मफल भोगने पडते हैं मात्र जब भक्तको कष्ट उसके पूर्व जन्मके कर्मफल अनुसार भी हो और वह आर्ततासे ईश्वरको पुकारे तो ईश्वर उसकी सहायता करते है या तो उसे कष्ट सहन करनेकी शक्ति देते हैं या उसकी भक्तिने पराकाष्ठाको स्पर्श कर लिया तो उसके कष्ट पूर्णत: नष्ट भी कर देते हैं अतः सज्जनों भक्त बनों और दुर्जनों ईश्वरकी लाठीसे डरो, यहांकी सरकार और न्यायालयसे अपने पाप बचा सकते हो उस अलौकिक सरकारके दंडसे बचना संभव है |-तनुजा ठाकुर



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