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अनेक जिज्ञासु एवं साधक ढोंगी गुरुके चक्रव्यूहमें फंस जाते हैं; परंतु मैंने देखा है कि जिस साधकमें साधना करनेकी, ईश्वरप्राप्ति की अत्यधिक तडप हो और साधकत्त्वका प्रमाण अधिक हो तो वह यदि अयोग्य गुरुके शरणमें चला भी जाये तो गुरुतत्
त्व उसका योग्य मार्गदर्शन करते हैं और उसके जीवनमें योग्य गुरुका प्रवेश स्वतः ही हो जाता है | खरे अर्थोंमें शिष्यकी पात्रता, उसकी गुरुभक्ति एवं स्तरके अनुसार गुरुतत्त्व कार्य करता है ! इस संदर्भमें एक प्रेरक कथा बताती हूं |
एक बार एक वयोवृद्ध दम्पतिको लगा कि उनके बच्चोंने अपने उत्तरदायित्व उठा लिए हैं अतः अब अधिक समय भगवद्भजनमें देना चाहिए एवं वे ग्रंथोंका पारायण करने लगे | ग्रंथोंको पढनेपर उन्हें बोध हुआ कि बिना गुरु गति नहीं अतः उन्होंने सोचा अब गुरु धारण करना चाहिए परन्तु गुरुको कहां ढूंढें इस सोचमें दोनों पड गए | पतिने पत्नीसे रात्रिमें सोते समय कहा, “कल ब्रह्म मुहूर्तमें उठकर स्नान और देवतापूजन कर दरवाजेके पास खडे हो जायेंगे जो पहला व्यक्ति मिलेगा उसे ही हम अपना गुरु मान लेंगे” | पत्नी धर्माचरणी थी अतः पतिकी बातको सहर्ष स्वीकार कर सो गयी | सुबह अपने नियोजन अनुसार दोनों स्नान-ध्यान कर गुरुकी आसमें दरवाजेपर हाथ जोड खडे हो गए | उस रात्रि एक चोर जो चोरी करने निकला था उसके हाथ कुछ न लगा था और वह निराश होकर लौट रहा था तभी इस दम्पतिने चोरको आवाज दी और उसे नमस्कार कर बोले, “आप हमारे गुरु हैं, हमारा प्रणाम स्वीकार करें” , यह कह दोनोंने चोरके चरण स्पर्श किये | चोरने सोचा कोई मूर्ख है ऐसे राह चलतेको कोई गुरु बनाता है क्या चलो इन्हें ठग लेते हैं | चोरने कहा, “ठीक है यदि मैं तुम्हारा गुरु हूं तो मुझे अपने घर ले चलो और मैं जैसा कहूं वैसा करना होगा” | चोरने सोचा क्यों न इनके भोलेपनका लाभ उठाकर इन्हें लूट लिया जाए | अतः चोरने उनसे अपने चरणोंका गुरुपूजन करवा कर भोजन ग्रहण किया और तत्पश्चात दोनोंको मुर्गा बननेका आदेश दिया और कहा, “तुम दोनोंने मुझे अपना गुरु माना है अतः जैसा आदेश दूं वैसा ही करो जब तक मैं उठनेके लिए न कहूं यूं ही मुर्गा बने झुके रहो, पतिने पत्नीसे कहा, “शिष्यके सभी गुणोंका राजा आज्ञापालन होता है अतः गुरुजी जैसा कहेंगे हमें वैसा ही करना है चाहे प्राण ही क्यों न निकल जाएं “ पत्नीने भी हामी भरी | चोर दोनोंको मुर्गा बना उनके तिजोरी वाले कमरेमें जाकर तिजोरीका ताला तोड सब कुछ लेकर, भाग गया | झुककर मुर्गा बने हुए रहनेसे कुछ घंटे पश्चात दोनों पति-पत्निके नाक और मुहंसे खून बहने लगा; परन्तु दोनोंने ठान रखी थी जब तक गुरुजी नहीं आज्ञा देंगे हम हिलेंगे नहीं | यह सब देख भक्त वत्सल श्रीविष्णु विह्वल हो गए | उन्हें लगा यदि यह भक्त दंपतिकी मृत्यु हो जाएगी तो गुरुतत्त्वसे मानवका विश्वास उठ जाएगा और कोई अपनी गुरुकी आज्ञाका पालन नहीं करेगा | अतः वे उनके समक्ष प्रकट हो बोले “ मैं विष्णु हूं तुम दोनोंकी गुरूभाक्तिसे प्रसन्न हूं | तुम दोनों उठ जाओ, जिसे तुम्हें मुर्गा बननेका आदेश दिया था वह कोई संत या गुरु नहीं अपितु एक चोर था” | पतिने कहा, “अब चाहे वह जो भी हो वे हमारे गुरु है जब तक वे आदेश नहीं देंगे चाहे हमारे प्राण ही क्यों न निकल जाये हम नहीं उठेंगे” | विष्णुजीने सोचा अब तो इनके प्राण बचानेके लिए चोरके पास ही जाना पडेगा | अतः वे तुरंत चोरके पास गए और बोले, “तुम्हें ध्यान है या नहीं तुमने उस भक्त दंपतिको जो आदेश दे रखा है उस कारण उनकी मृत्यु हो जाएगी अतः तुरंत जाकर उन्हें उस मुद्रासे उठनेकी आज्ञा दो” | चोरने कहा, “तुम कौन हो वेशभूषा से तो नारायण दिख रहे हो” | भगवान नारायणने कहा, “हां मैं नारायण हूं, तुमने मेरे भक्त दंपतिके प्राण संकटमें डाल दिये हैं, उन्होंने तुम्हें गुरु माना और तुमने उनके आस्थाको ठगा है, वे अपने अंतिम सांसे गिन रहे मैंने उन्हें मुर्गाकी मुद्रा छोडनेके लिए कहा तो वे कहने लगे कि जब तक हमारे गुरु आदेश नहीं देंगे हम नहीं उठेंगे | यदि उनकी मृत्यु हो गाय तो अनर्थ हो जाएगा गुरु शब्दसे मानवका विश्वास उठ जाएगा, अतः अभी तुरंत चलो और उन्हें उठाओ अन्यथा तुम्हें कठोर दंड दूंगा” | चोर नारायणकी बात सुनकर डर हो गया और दोनों तुरंत उस दंपतिके पास पहुंचे | चोरने उन्हें उठनेके आदेश दिए और उनके चरण स्पर्श कर क्षमा मांगी | चोरने कहा , “मैं तो महापापी, एक चोर हूं; परंतु आपकी गुरुभक्तिने मुझे नारायणके दर्शन करा दिये धन्य है आपकी गुरुभक्ति, मैं पापी, आपके गुरु बननेके लायक नहीं ! दोनों पति-पत्निने खडे होकर भगवान श्री नारायणको प्रणाम किया और नारायणने अपनी कृपाका वर्षाव कर दोनोंको कुछ क्षणमें ही पूर्व रूप स्वस्थ कर दिया |
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