प्रजाको गोसंरक्षणके लिए क्यों सिद्ध होना पडता है


इस देशके राजनेताओं, प्रशासन एवं न्यायतन्त्रने एक बार यह अवश्य ही अन्तर्मुख होकर सोचना चाहिए कि हिन्दू बहुल राष्ट्रमें हिन्दुत्त्वनिष्ठोंको स्वयंसिद्ध होकर गोशालायें क्यों चलानी पडती हैं, क्यों उन्हें गोरक्षण हेतु प्रयास करने पडते हैं ?

 जिस देशमें गायको हम माताका स्थान देते हैं, क्या उसकी पापियोंसे रक्षा करना अधर्म है ? जिस देशके पवित्रतं ग्रन्थमें (वेदमें) यह स्पष्ट लिखा है कि गोमाता ‘अवध्य’ है, उस देशमें प्रतिदिन सहस्रों गोवंशोंको पशुवधगृहमें (कत्लखानेमें) वध कर दिया जाता है, ऐसेमें उस देशके हिन्दुत्त्वनिष्ठ, इस अत्याचारको कितने समयतक हाथपर हाथ धरे देख सकते हैं ?!

 हमारे धर्मशास्त्रोंमें राजाको गोसंरक्षक कहा गया है; किन्तु यदि वह ऐसा करनेमें असफल रहे तो क्या शेष हिन्दू भी मूकदर्शक बन गोवंशपर अत्याचार होता देखते रहे ? अपने प्राणोंको संकटमें डालकर गौ माताका रक्षण करनेवालोंको तो विशेष रूपसे राजकीय स्तरपर सम्मानित करना चाहिए; किन्तु इस तथाकथित धर्मनिरपेक्ष व्यवस्थामें ऐसी अपेक्षा करना व्यर्थ है; अतः इस स्थितिको परिवर्तित करने हेतु हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना करना अपरिहार्य हो गया है !



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