प्रेरक कथा


आदि शंकराचार्य जब संपूर्ण देशमें भ्रमण कर शास्त्रार्थ कर धर्म संस्थापनाका कार्य कर रहे थे । और परम्परा अनुसार अन्य विद्वानोंको शास्त्रार्थके लिये कहते । और हार जानेपर हार जानेवालेको अपनी माला उतारकर उनके गलेमें डालनी होती थी । शंकराचार्य परकाया प्रवेश विद्याके निष्णात साधक थे । जब मंडन मिश्र और शंकराचार्यका शास्त्रार्थ हुआ । तो ये तय हुआ कि इनमेंसे जो हारेगा, वो दूसरेका शिष्य बन जायेगा । मण्डन मिश्र भारतके विख्यात विद्वान और ग्रहस्थ थे । उनकी पत्नी भारती भी अत्यन्त विदूषी थीं । शंकराचार्य संन्यासी थे । और उन्होंने शास्त्रार्थके माध्यमसे भारत विजय करनेके उद्देश्यसे अनेक यात्रायेंकी थी; परन्तु  वे सर्वश्रेष्ठ तभी माने जा सकते थे जब वे मिथिलाके महान विद्वान पंडित मण्डन मिश्रको पराजित करते । प्रश्न यह था कि इन दोनोंके शास्त्रार्थका निर्णय कौन करता ? क्योंकि कोई सामान्य विद्वान तो इसका निर्णय नहीं कर सकता था । अतः शंकराचार्यके अनुरोधपर निर्णयके लिये मिश्रकी पत्नी भारतीका ही चयन किया गया । यह शास्त्रार्थ अनेक दिवस दिन चला और अंतत: मण्डन मिश्र पराजित हो गये । यह देखकर भारतीने निर्णय दिया कि मिश्र जी हार गये हैं; अतः वे शंकराचार्यका शिष्यत्व स्वीकार करें और संन्यास दीक्षा लें । यह कहकर वह विद्वान पत्नी निर्णायक पदसे नीचे उतरी  और शंकराचार्यसे कहा – “मैं मण्डन मिश्रकी अर्धांगिनी हूं; अतः अभी तक मिश्र जीकी अर्ध पराजय हुई है । जब आप मुझे भी पराजित कर देंगे तब मिश्रजीकी पूर्ण पराजय मानी जायेगी ।“
यह तथ्य भी उचित था । अबकी बार मण्डन मिश्र निर्णायक बने । भारती तथा शंकराचार्यमें शास्त्रार्थ होने लगा । 21 वें दिन जब भारतीको लगा कि अब उसकी पराजय होने ही वाली है तब उसने शंकराचार्यसे कहा – “अब मैं आपसे अंतिम प्रश्न पूछती हूं और इस प्रश्नका भी उत्तर यदि आपने दे दिया तो हम अपने आपको पराजित मान लेंगे । और आपका शिष्यत्व स्वीकार कर लेंगे । शंकराचार्यके हामी भरनेपर भारतीने कहा – सम्भोग क्या है ? यह कैसे किया जाता है ? और इससे संतानका निर्माण किस प्रकार हो जाता है ?” |

यह सुनते ही शंकराचार्य प्रश्नका अर्थ और उसकी गहराई समझ गये । यदि वे इसी स्थितिमें क्योंकि संन्यासीको, बाल ब्रह्मचारीको संभोगका ज्ञान होना असम्भव ही है अतः कुछ देर विचार करते हुये शंकराचार्यने कहा – क्या इस प्रश्नका उत्तर अध्ययन और सुने गये विवरणके आधारपर दे सकता हूं या इसका उत्तर तभी प्रमाणिक माना जायेगा जबकि उत्तर देनेवाला इस प्रक्रियाका व्यवहारिकरूप से अनुसरण कर चुका हो ?”
तब भारतीने उत्तर दिया कि व्यवहारिक ज्ञान ही वास्तविक ज्ञान होता है, यदि आपने इसका व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त किया है अर्थात किसी स्त्रीके साथ यौन क्रिया आदि काम भोग किया है  तो आप निसंदेह उत्तर दे सकते हैं ।

शंकराचार्य जन्मसे ही संन्यासी थे अतः उनके जीवनमें कामकलाका व्यावहारिक ज्ञान धर्म संन्यास धर्मके सर्वथा विपरीत था इसलिए उस समय उन्होंने कहा कि – “मैं इसका उत्तर छह माह पश्चात्  दूंगा ।“ तब शंकराचार्यने मंडन मिश्रकी पत्नीसे छ्ह माहका समय लिया । और अपने शिष्योंके पास पहुंचकर कहा कि – “मैं छह मासके लिये दूसरे शरीरमें प्रवेश कर रहा हूं तब तक मेरे शरीरकी देखभाल करना ।“ यह कहकर उन्होनें अपने सूक्ष्म शरीरको उसी समय मृत्युको प्राप्त हुये एक राजाके शरीरमें डाल दिया । मृतक राजा अनायास उठकर बैठ गया ।
राजाके अचानक जीवित हो उठनेपर सब अत्यधिक प्रसन्न हुए परन्तु राजाकी एक  रानीको, कुछ ही दिनोंमें उसे मृतसे जीवित हुए पतिपर शक होने लगा; क्योंकि पुनर्जीवित होनेके पश्चात्  राजा केवल कामवासनामें ही रुचि लेता था । और कामकलाके विषयमें भिन्न प्रकारके प्रश्न करता था । रानीको इसपर कोई आपत्ति न थी; परन्तु  जाने कैसे वह समझ  गई कि राजाके शरीरमें जो दूसरा है वो अपना काम समाप्त करके चला जायेगा  इसलिए  उसने अपने विश्वस्त सेवकोंको आदेश दिया, “जाओ, आसपास गुहा (गुफ़ा) आदिमें देखो । कोई मृत देह ऐसी है क्या जिसे संभालकर रखा गया हो । या जिसकी कोई सुरक्षा कर रहा हो । ऐसा शरीर मिलते ही नष्ट कर देना ।”

उधर राजाके शरीरमें शंकराचार्यने जैसे ही ध्यान लगाया । उन्हें संकटका आभास हो गया । और वो उनके पहुंचनेसे पहले ही राजाके शरीरसे निकलकर अपने शरीर में प्रविष्ट हो गये ।  शंकराचार्यने कामकलाका व्यवहारिक ज्ञान लेकर शंकराचार्य पुनः अपने शरीरमें आ गये; इस प्रकारसे जिस शरीरसे उन्होंने संन्यास धर्म स्वीकार किया था, उसको भी खन्डित नहीं होने दिया । इसके पश्चात् पुनः मन्डन मिश्रकी पत्नी भारती को उसके संभोग विषयक प्रश्नका व्यवहारिक ज्ञानसे उत्तर देकर उनपर विजय प्राप्त की । और उन दोनों पति-पत्नीको अपनी शिष्यता प्रदान की । और अपने आपको भारतका शास्त्रार्थ विजेता सिद्ध किया ।



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