
बात उन दिनों की है, जब शिवाजी मुगल सेना से बचने के लिए वेश बदलकर इधर-उधर भटक रहे थे। इसी क्रम में एक दिन शिवाजी एक दरिद्र ब्राह्मण के घर रूके। अति निर्धनता होते हुए भी उसने शिवाजी का यथाशक्ति स्वागत – सत्कार किया। एक दिन तो वह खुद भूखा रहा, परंतु शिवाजी के लिए भोजन की व्यवस्था की। शिवाजी को पता लगा तो उन्हें अपने आश्रयदाता की यह दरिद्रता भीतर तक चुभ गई। उन्होंने सोचा कि किसी तरह उसकी मदद की जाए। शिवाजी ने उसी समय ब्राह्मण की दरिद्रता दूर करने का एक उपाय सोचा। उन्होंने एक पत्र वहां के मुगल सूबेदार को भिजवाया। पत्र में लिखा था कि शिवाजी इस ब्राह्मण के घर रूके हैं। वह उन्हें पकड़ ले और इस सूचना के लिए इस ब्राह्मण को दो सहस्र अशर्फियां दे दें।
सूबेदार शिवाजी की चरित्रगत ईमानदारी और बड़प्पन को जानता था। उसने ब्राह्मण को दो सहस्र अशर्फियां दे दीं और शिवाजी को गिरफ्तार कर लिया। बाद में तानाजी से यह सुनकर कि उसके अतिथि और कोई नहीं स्वयं शिवाजी महाराज थे, ब्राह्मण छाती पीट-पीटकर रोने लगा और मूर्छित हो गया। तब तानाजी ने उसे सांत्वना दी और बीच मार्ग में ही सूबेदार से संघर्ष कर शिवाजी को मुक्त करा लिया। जिसने भी इस घटना के बारे में सुना उसने कहा कि महान होने की सच्ची कसौटी यही आभार भाव है, जो किसी सामान्य व्यक्ति द्वारा की गई छोटी – सी सहायता पर भी विनम्रता से प्रकट किया जाता है।
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