
निष्पाप व्यक्ति
माता पार्वतीने एक बार शिवजीसे पूछा, ‘‘स्वामी, आप राम नाम इतना लेते हैं और इसका इतना महात्म्य भी बतलाते हैं; परन्तु संसारके अनेक व्यक्ति भी तो इस नामको इतना रटते हैं, ऐसेमें क्या कारण है कि उनका उद्धार नहीं होता ?’’
शिवजी बोले, ‘‘उन्हें राम नामकी महिमामें विश्वास नहीं है ।’’
माता पार्वती बोलीं, “स्वामी, इस कथनका क्या तात्पर्य हुआ ?”
इसपर शिवजी माता पार्वतीके साथ अपने कथनको सिद्ध करने हेतु परीक्षा लेनेके लिए भेष परिवर्तित करके काशीके एक घाटपर बैठ गए, जहांसे लोग राम नाम रटते हुए और गंगा स्नानकर लौट रहे थे ।
शिवजी एक कीचडसे भरे एक गड्ढेके भीतर चले गए और माता पार्वती उस गड्ढेके बाहर बैठ गईं । इसके पश्चात जो भी व्यक्ति उस मार्गसे निकलता, माता पार्वती उनसे कहतीं, ‘‘कोई मेरे पतिको गड्ढेसे निकाल दो ।’’ यह सुनकर जो भी व्यक्ति उनकी सहायताके लिए आगे आता, तब वे उससे कहतीं, ‘‘जो भी व्यक्ति निष्पाप हो, केवल वही मेरी सहायता करे, अन्यथा वह भस्म हो जाएगा ।’’
इस प्रकार एक-एक करके अनेक व्यक्ति आए; परन्तु माता पार्वतीका कथन सुननेके पश्चात लौट गए | इसी क्रममें संध्याका समय हो गया; किन्तु कोई निष्पाप व्यक्ति उनकी सहायताके लिए नहीं मिला; अंततः गौधूलिकी बेलामें गंगास्नानकर एक व्यक्ति आया और राम नाम रटता हुआ वहांसे निकलते हुए माता पार्वतीको देखकर रुक गया | उनकी सहायता हेतु जैसे ही शिवजीको गड्ढेसे निकालनेके लिए वह आगे आया तो पार्वतीजीने पुनः कहा, “मेरी सहायता केवल निष्पाप व्यक्ति ही करे अन्यथा वह भस्म हो जाएगा |”
माता पार्वतीका यह कथन सुनते ही वह व्यक्ति बोला, “माता, अभी गंगास्नान कर आया हूं और राम नाम ले रहा हूं, तथापि पाप लगा ही है क्या ? पाप तो एक बार राम नाम स्मरणसे ही समाप्त हो जाता है, इसी कारण मैं सर्वथा निष्पाप हूं और मैं इस व्यक्तिको अवश्य ही निकालूंगा ।”
इस कथाका सार – सामान्य व्यक्तिकी स्थिति भी ऐसी ही है; गंगास्नान करते हैं, राम नाम लेते हैं; परन्तु अपनेको सर्वथा निष्पाप नहीं मानते । नाममें और गंगामें हमारा पूर्ण विश्वास नहीं है; किन्तु नामकी महिमा अपरम्पार है, उसका संस्कार अमिट है। भगवान नामकी ही भांति चेतन हैं और उनकी शक्ति भी अनंत है । अतः श्रद्धापूर्वक हमें नामस्मरण करना चाहिए |