एक राजाके पास एक विद्वान पण्डित आते थे, वह प्रतिदिन राजाको एक कथा सुनाते थे । राजा इस कार्य हेतु उन्हें वेतन भी देते थे, जिससे पण्डितजीकी आजीविकाका प्रबन्ध सुगम हो गया था । यह क्रम अनेक वर्षोंसे निरन्तर चला आ रहा था । एक दिवस राजाने पण्डितजीसे कहा, “विप्रवर, आपके मुखसे कथा श्रवण करते अनेक वर्ष हो गए तथा इस मध्य आप एवं मैं दोनों वृद्ध भी हो चुके हैं; किन्तु मुझे स्वयंमें कथा श्रवणका कोई प्रभाव नहीं दिखता । आपके वेतनसे राजकोषमें कुछ सहस्र रुपयोंकी क्षतिके साथ ही मेरा बहुमूल्य समय भी नष्ट होता है । आप वैराग्य, भक्ति एवं ज्ञानकी चर्चा करते हैं, मैं इसे सुनता भी हूं; किन्तु न तो मैं भक्त बना तथा न ही ज्ञानी, सदाचारी एवं योगी बना । मुझमें सुधार क्यों नहीं होता ? आप इसका उत्तर एक माहकी समयावधिके भीतर दें, अन्यथा कथा श्रवण एवं आपका वेतन बन्द कर दिया जाएगा तथा आपको अपनी आजीविका हेतु किसी अन्य मार्गका चयन करना होगा ।
यह सुनकर पण्डितजी दुःखी हो गए तथा विचार करने लगे कि मैं इसका क्या उत्तर दूं ? चिन्तामग्न होकर अपने निवास लौटनेके क्रममें मार्गमें उन्हें एक साधु मिले । पण्डितजीको दुःखी देखकर साधुने कारण पूछा तो उत्तरमें पण्डितजीने साधुको सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया । साधु अत्यन्त विरक्त एवं त्यागी थे । उन्होनें पण्डितजीसे कहा, “आप इस हेतु चिन्तित न हों, इसका उत्तर तो मैं दे दूंगा । आपका सम्मान कम न हो, इसलिए आप राजासे कहें कि यह एक सामान्यसा प्रश्न है, इसका उत्तर तो मेरा शिष्य ही दे देगा ।”
अगले दिवस पण्डितजी राजाके पास गए तो राजाने पूछा, “क्या आपने उस विषयका उत्तर विचार कर लिया ?” प्रत्युत्तरमें पण्डितजीने कहा, “महाराज, यह तो एक सामान्यसा प्रश्न है, इसका उत्तर मेरा शिष्य ही दे देगा ।” राजाने कहा, “उत्तर आप दें या आपका शिष्य, मुझे मेरे प्रश्नका उत्तर चाहिए । आप कल अपने शिष्यको लेकर आएं !”
अगले दिवस साधुको अपने शिष्यके रूपमें लेकर पण्डितजी राजाके पास गए तो राजाने साधुसे पूछा, “क्या आप इनके शिष्य हैं ?” साधुने उत्तर दिया, “जी हां !” राजाने पुनः पूछा, “क्या आपको मेरा प्रश्न ज्ञात है ?” साधुने कहा, “आपका प्रश्न है कि ज्ञान, वैराग्य, भक्तिकी कथाएं सुनते अनेक वर्ष व्यतीत हो गए; किन्तु इसका प्रभाव आपपर क्यों नहीं हुआ ?” राजाने सहमतिमें ‘हां’ कहा । तदनन्तर साधुने कहा, “मैं आपके प्रश्नका उत्तर तभी दे सकता हूं, जब आप अपने राज्यकी सम्पूर्ण शक्ति एवं अधिकार एक दिवस हेतु मुझे दे दें !” राजाने स्वीकृति दे दी तथा अपने सेवकों एवं कर्मचारियोंसे कहा, “अपने राज्यके सम्पूर्ण अधिकार मैं एक दिवस हेतु इन्हें देता हूं, आप सभी इनकी आज्ञाका पालन करें !”
तत्पश्चात साधुने सेवकोंको दो रस्सियां लानेका आदेश दिया । रस्सियां मंगानेके पश्चात साधुने सर्वप्रथम सेवकोंसे राजाको बांधने हेतु कहा । राजाने आश्चर्यचकित होकर पूछा, “यह क्या उद्दण्डता है ?” साधुने कहा, “महाराज, आप वचनबद्ध हैं ।” राजा शान्त हो गए । तदनन्तर साधुने सेवकोंसे उसी प्रकार पण्डितजीको भी बांधने हेतु कहा । रस्सियोंसे दोनोंके बांधे जानेके कुछ समय पश्चात साधुने पण्डितजीसे कहा, “आपने कथा वाचनके माध्यमसे दीर्घ अवधितक महाराजकी सेवा की है । रस्सियोंसे बांधे जानेके कारण आप कष्टमें हैं, आप महाराजसे आग्रह करें कि वह आपको बन्धनमुक्त करनेकी व्यवस्था करें !” पण्डितजीने राजासे कहा, “महाराज, आप कृपा करके मुझे बन्धन मुक्त करनेकी व्यवस्था करें !” राजा बोले, “यहां मेरा आदेश प्रभावहीन है ।” पण्डितजी बोले, “आप स्वयं ही मेरे बन्धन खोल दें !” राजाने कहा, “यह भी असम्भव है, मैं स्वयं बन्धनमें बंधा हूं ।” अब साधुने पण्डितजीसे भी कहा, “आप कृपा करके महाराजको बन्धनमुक्त करनेकी व्यवस्था करें !” पण्डितजीके उत्तर देनेसे पूर्व राजाने ही कहा, “यह कैसे सम्भव है ? पण्डितजी तो स्वयं बन्धनमें बन्धे हैं !”
अब साधुने मुस्कुराते हुए राजासे पूछा, “महाराज, आपको अपने प्रश्नका उत्तर मिला ?”
राजाने कहा, “मैं नहीं समझा ।” साधु बोले, “महाराज, जो स्वयं बन्धनमें बंधा हुआ है, क्या वह अन्यके बन्धन खोल सकता है ? पण्डितजी आपको प्रतिदिन कथा श्रवण तो कराते हैं; किन्तु ये स्वयं संसारके बन्धनोंसे बन्धे हुए हैं तथा आप इनसे मुक्तिकी अपेक्षा रखते हैं ! यदि पण्डितजी स्वयं मुक्त होते तो आपको मुक्त कर सकते थे ।
कथावाचकमें तीव्र वैराग्य ही नहीं, वरन परमात्माका तत्त्वज्ञान भी होना चाहिए । अनेक कथावाचक कहते हैं कि हम तो श्रेष्ठ हैं, श्रोतामें ही श्रद्धा, प्रेम, बुद्धि, एवं योग्यताका अभाव है । ऐसे कथावाचकोंको समझना चाहिए कि श्रोतामें योग्यताका अभाव है, तभी तो वह जिज्ञासु या श्रोताके रूपमें आपके सम्मुख आया है । वक्ता यदि स्वयं ज्ञानी है तो श्रोता तो अज्ञानी है ही, वक्ताका कर्तव्य है कि वह श्रोताके दोषोंका निर्मूलन करे ! यदि वक्तामें श्रोताकी योग्यता निर्माणकी शक्ति नहीं है तो वक्ताको स्वयंको उपदेष्टा, महात्मा, योगी या गुरु कहनेका अधिकार भी नहीं है । ऐसे कथावाचकोंको श्रोताओंसे स्पष्ट कहना चाहिए कि मैं एक साधारण मनुष्य हूं, मैं उपदेष्टा, महात्मा, योगी या गुरु नहीं हूं । मुझमें आपका उद्धार करनेकी शक्ति नहीं है । मैं मनुष्यके कल्याण हेतु महापुरुषों या ईश्वरके वचनोंको मात्र अपनी भाषामें कहता हूं ।” यह कहकर साधुने राजा तथा पण्डितजीके शरीर एवं ज्ञान चक्षु, दोनोंको बन्धनमुक्त करके वहांसे प्रस्थान किया ।
Leave a Reply