पूजा करते समय होने वाली अयोग्य कृति :
निम्न अयोग्य कृति यदा-कदा घटित होती दिखाई देती है –
अ : देवताकी मूर्ति सिर पकडकर उठाई जाती है तथा हाथमें लटकाई जाती है ।
आ : देवता /संत अथवा सदगुरुका छायाचित्र किसी भी प्रकार पोछा जाता है ।
इ : गंध, कंकु किसी भी प्रकार लगा दिया जाता है । कभी देवताकी नेत्रमें तो कभी
पूर्ण मुख ही ढक दिया जाता है ।
ई : फूल किसी भी प्रकार चढाए जाते हैं । कभी वे चित्र /मूर्तिके अनुसार योग्य
आकारके नहीं होते । उनसे पूरी मूर्ति या चित्र ढक जाता है ।
उ : पूजा करते समय ध्यान यत्र-तत्र होता है, अथवा किसीसे अनावश्यक वार्तालाप की जाती हैं ।
यह सभी उदाहरणसे ज्ञात होता है कि कर्म मात्र पूजा करनी थी इसलिये की और भावका अभाव दर्शाते हैं । इससे अध्यात्मिक लाभ न होकर ईश्वरकी अवकृपा होती है । इससे ज्ञात होता है कि हिंदुओंको कितनी छोटी-छोटी तथ्योंका धर्म-शिक्षण आवश्यक है ।
पूजा करनेकी योग्य कृति
निम्न प्रकारसे पूजा करनेपर लाभ अवश्य होता है ।
अ : देवताकी मूर्ति अथवा चित्र दोनों हाथोंसे संभालकर मध्यभागसे उठायें ।
आ : देवता, संत अथवा गुरुको पोछते समय वे साक्षात् हैं, यह सोचकर, हम उन्हें पोछ रहे हैं यह उन्हें बताकर ऊपरसे नीचेतक एक एक अंग पोछें । मां बच्चेको कैसे नहलाती है, उसे बताती है कि मैं तुझे नहला रही हूं, तुम नेत्र बंद कर लो अन्यथा नेत्रमें जल चला जायगा । इस प्रकर उससे बोलते हुए, उसे कल्पना देते हुए, उसकी चिंता करते हुए उसे नहलाती है । उसी प्रकार हमें भी देवताकी चित्र, मूर्ति अथवा संत या गुरुका छायाचित्र पोछना चाहिये । कृति भावपूर्ण होना चाहिए । चित्र या छायाचित्र पोछते समय पहले संत या गुरुको पोछें, पुनः चित्रका अन्य भाग पोंछे ।
इ : गंध या कुमकुम लगाते समय उसे माथेपर योग्य आकारमें लगायें सिर
पर ना जाने दें। मूर्तिके चरणोंमें कुमकुम चढायें ।
ई : योग्य आकार एवं योग्य प्रकारके सात्विक रचनावाले फूल चढायें ।
उ : पूजा करते समय अन्यत्र ध्यान न जाये, एकाग्रतासे पूजा करें ।
ऐसा करनेसे उन देवता, संत या गुरुका तत्व जागृत हो, हमें उसका लाभ मिलेगा । – परात्पर गुरु डॉ . जयंत आठवले (२०.१.२०१४)
सन्दर्भ : मराठी दैनिक सनातन प्रभात
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