जनवरी ९, २०१९
कांग्रेसके वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मन्त्री पी चिदंबरमने शुक्रवार, ८ फरवरीको कहा कि राम मंदिर ‘आस्था’का और सबरीमाला ‘प्रथा’का प्रकरण है और दोनोंको आपसमें मिलाना नहीं चाहिए । उनकी यह टिप्पणी ‘अनडॉटेड: सेविंग द आइडिया ऑफ इंडिया’ पुस्तकके विमोचनके समय आई ।
सबरीमाला और राम मन्दिरके प्रकरणपर पूछे गए प्रश्नके उत्तरमें कहा, “मैं अधिक धार्मिक व्यक्ति नहीं हूं । हम ये नहीं कह रहे कि न्यायालयको इसपर निर्णय नहीं देना चाहिए था । मैं न्यायालयके निर्णयको स्वीकार करता हूं; परन्तु मैं कैसे किसी साधारण व्यक्ति और कार्यकर्ताको उसे अपने विचार व्यक्त करनेसे रोक सकता हूं ? अयोध्या प्रथाका प्रकरण नहीं है । प्रथा और आस्थाको आपसमें मत मिलाइए । सबरीमालाका प्रकरण प्रथाका है, जो आधुनिक संवैधानिक मूल्योंके विरुद्घ है । अयोध्या प्रकरण आस्थाका है । कुछ लोग मानते हैं कि यही भगवान रामकी जन्मभूमि है । इसीके आधारपर वे इस भूमिपर दावा करते हैं । कुछ अन्य लोग कहते हैं कि अयोध्यामें सैकडों वर्षोंसे मस्जिद थी । अब प्रश्न यह है कि क्या उच्चतम न्यायालय इलाहाबाद उच्च न्यायालयद्वारा निर्धारित प्रकरणका समाधान करेगा ? इनमेंसे कई न्यायिक संकल्पके लिए उत्तरदायी हैं ? मुझे नहीं लगता कि हमें आस्था और प्रथाको मिलाना चाहिए ।”
“सभी नास्तिक बुद्धिवादियोंका धर्मविषयक ज्ञान कितना दुर्बल है, इससे ही बोध होता है ! जिस व्यक्तिको यहतक ज्ञात नहीं कि आस्था और प्रथा क्या है ?, तदोपरान्त भी ज्ञान देना आवयक है और जब धर्महीन ज्ञान देता है तो उसमें वहीं बातें निकलकर आती हैं, जिनका वर्णन चिदम्बरमने किया है । सबरीमाला जैसी महान परम्पराको मात्र एक प्रथा बताना उसका अपमान है और चिदम्बरमको तो इतिहासका भी ज्ञान नहीं है, जो कह रहे हैं कि वहां मस्जिद थी; इसलिए ही हिन्दू माता-पिताका बालकोंको धर्म सीखाना आवयक है ! ”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : फर्स्ट पोस्ट
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