
कोमलाङ्गं विशालाक्षं इन्द्रनील समप्रभम्
दक्षिणाङ्गे दशरथं पुत्राप्येक्षेण तत्परम् ।
प्रष्टतो लक्षमणं देवं सछत्रं कनक प्रभम्
पार्श्वे भरत शत्रुघ्न चामर व्य्जनान्वितौ
अग्रेत्यग्रौ हनूमन्तं रामानुग्रह कांक्षिणम् ।।
अर्थ : कोमल अंग वाले , सर्वत्र दैदीप्यमान होनेवाले विशाल नेत्रवाले , जिनके दाहिने ओर दशरथ अपने पुत्रको पूर्ण भक्तिसे देख रहे हैं, जिनके पीछे लक्ष्मण एक स्वर्ण छत्र लिए खड़े हैं, और अनुज भारत और शत्रुघ्न चामर डुला रहे हैं और सामने हनुमान प्रभु श्रीरामकी कृपा पाने हेतु आतुर , विराजमान हैं। ऐसे प्रभु श्री रामको वंदन है।
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