फरवरी २५, २०१९
‘न्यूज१८ राइजिंग इण्डिया’ कार्यक्रममें बाबा रामदेवने कहा कि योग साधारण लोगोंके जीवनसे इसलिए दूर हो गया; क्योंकि विशेष लोगोंने माना कि उन्हींका प्रत्येक वस्तुपर अधिकार है । मैं ब्राह्मण नहीं, ब्राह्मणवादके विरुद्घ हूं, और चाहता हूं कि सभीको विकासका समान अवसर मिलना चाहिए ।
रामदेवने कहा कि भारतकी भूमिपर धर्म और अध्यात्मको एक ही माना गया है; परन्तु विदेशमें धर्म और आध्यात्मको पृथक कर दिया गया । भारतमें नहीं बस विदेशी लोगोंकी दृष्टिमें ये पृथक है । बाइबिल और कुरआनका कोई अपमान नहीं करता; परन्तु यहां योग और वेदोंकी आलोचना साधारण बात बन गई है ।
योग और भोगसे जुडे एक प्रश्नके उत्तरमें रामदेवने कहा कि जो भी इस विश्वमें दिखाई देनेवाली वस्तु है, वह भोग है; परन्तु सुख, दुःख जैसी भावनाएं, जो दिखाई नहीं देती, वह योग है . भोग बुरी वस्तु नहीं है; परन्तु वो योगके अनुसार ही करना चाहिए । हमारे पूर्वजोंने बडे साम्राज्य स्थापित किए हैं और हम इसलिए ही विश्वगुरु थे । मैंने योगको सरल और वैज्ञानिक बनाकर लोगोंतक पहुंचाया ।
“ब्राह्मण सदृश वेश धारणकर ब्राह्मण विरुद्घ बातें करना रामदेव बाबाके लिए अशोभनीय है । इससे ब्राह्मणोंपर प्रभाव नहीं पडेगा, वरन उनकी ही अपकीर्ति होगी । मानते हैं कि ब्राह्मणोंंसे भी कुछ चूकें हुई हैं, तभी आज धर्मकी यह स्थिति है; परन्तु आज जो भी धर्म शेष है, वह ब्राह्मणोंके कारण ही है ! स्वामीजी एक ऐसे खरे और योग्य सन्तका नाम बता दें, जिन्होंनें पात्रकी क्षमतानुसार अपना ज्ञान समान रुपसे वितरण न किया हो; यदि स्वामी जी चाहते हैं कि कुपात्रको भी दान दिया जाए तो वह सम्भव नहीं ! कुपात्रको ज्ञान दिया अर्थात अर्धज्ञान और अर्धज्ञान अधिक भयावह होता है; क्योंकि वह समाजको नष्ट कर देता है । इसके अनेकोनेक प्रत्यक्ष उदाहरण आज समाजमें देखे जा सकते हैं । जैसे सबरीमालामें मन्दिरका विज्ञान न जाननेवाले अर्धज्ञानियोंने इसे नारीवादका अपमान आदिसे जोडकर देखा तो कुछ केवल परम्पराका नाम लेकर मौन रह गए ! इससे उचित तो यही होता कि जिस अर्धज्ञानको एकत्रकर उन्होंने विरोध किया, उन्हें वहीं न दिया जाता, इससे ही ज्ञात होता है कि सभीको वेद पढाना कितना हानिकारक है । जैसे आर्यसमाजी वेदका एक वाक्य उठाकर कहते हैं कि पत्थर मत पूजो, वहीं वेदके ही दूसरे वाक्य जिसमें साकार ब्रह्मकी बात कही है, उसे अनदेखा करते हैं, यह अर्धज्ञान ही तो है और स्वामीजीको ज्ञात होगा कि ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ अर्थात कर्मोंकी कुशलता और पूर्णता ही योग है तो इससे तो किसीको वंचित किया ही नहीं जा सकता है । पूर्णताको चाहनेवाला प्रत्येक व्यक्ति स्वतः ही वे कृतियां करता है, जिससे वह योगारूढ हो, तो इसमें न चाहनेवालेको बलपूर्वक कैसे सिखाया जाए ?; अतः बाबाका यह कथन पूर्णतया असत्य व मिथक है !”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : फर्स्टपोस्ट
Leave a Reply