शासकीय चाकरीमें अनुसूचित जाति-जनजातिके विषयमें आरक्षण कैसा हो ? यह राज्य शासन निर्धारित करे !’ – उच्चतम न्यायालय


३० जनवरी, २०२२
       महाराष्ट्रमें वर्ष २००४ में तत्कालीन ‘कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस गठबंधन शासन’ने संविधानकी धारा १६(४) के अनुसार सभी शासकीय अर्ध शासकीय कर्मचारियोंपर पदोन्नति हेतु आरक्षण लागू किया । अगस्त २०१७ को मुम्बई उच्चन्यायालयने यह ३३ प्रतिशत आरक्षण अवैध घोषित किया । इसके उपरान्त महाराष्ट्र शासनने ७ मई २०२१ को पदोन्नतिमें आरक्षण निरस्तकर सेवाकी वरिष्ठता अनुसार पदोन्नति देनेका निर्णय लिया था ।
       इस आदेशका तीव्र विरोध किया गया । इसके विरुद्ध उच्चतम न्यायालयमें याचिका प्रस्तुत की गई । इसपर उच्चतम न्यायालयने निर्णय दिया कि पदोन्नतिमें आरक्षणके लिए अपर्याप्त प्रतिनिधित्वके आकडोंका अवलोकन करना राज्य शासनका दायित्व है । पूर्वमें दिए गए मापदण्डोंको हम परिवर्तित नहीं कर सकते । इस सम्बन्धमें पुनः किसी याचिकापर विचार नहीं करेंगे ।
      डॉ भीमराव अंबेडकरने आरक्षण मात्र १० वर्षोंके लिए लागू करवाया था । उसे स्वार्थी नेताओंने ‘वोट’ प्राप्तिका साधन बनाकर अबतक लागू रखा है । समाजमें विधान सबके लिए एकसा होना चाहिए । इससे बुद्धिमान साधारण जनका शोषण हो रहा है । हिन्दू राष्ट्रमें सभी नागरिकोंको एक दृष्टिसे देखा जाएगा । धर्म, जाति जैसे आधारपर भेदभाव अमान्य होगा । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ


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