चेतश्चञ्चला वृत्या चिन्तानिचयचञ्चुरम् ।
धृतिं बन्धाति नैकत्र पञ्जरे केसरी यथा ।। – श्री वशिष्ठदर्शनं (१:१६:१०)
अर्थात मनका मुख्य कार्य चिन्ता करना है, अपनी अस्थिर वृत्तिके कारण यह एक स्थानपर उसी प्रकार स्थिर नहीं रहता जैसे बद्ध सिंह अपने पिंजरेमें अस्थिर रहता है । वस्तुत: मनकी परिभाषा ही है कि वह संस्कारोंका एक पुंज मात्र है; अतः उसका अपनी प्रकृति या संस्कार अनुरूप वर्तन करना स्वाभाविक है । मनको हम विषय-वासनाओंके किसी भी भोगके माध्यमसे अधिक समय तक स्थिर नहीं रख सकते हैं, मात्र साधना करनेपर जब बुद्धि सात्त्विक होकर विवेक-बुद्धिमें परिणत हो जाती है तो उसके बलपर हम मनको नियंत्रित करनेका प्रयास कर सकते हैं और सतत इन्द्रिय निग्रह करते रहनेपर मन विषयोंके प्रति अनासक्त हो जाता है तथा साधनामें अखण्डता बनाए रखनेपर उसका लय हो जाता है; मन तभी सदैवके लिए स्थिर और शान्त हो जाता है । सतत इन्द्रिय निग्रह हेतु मनका अन्तर्मुखी होना अति आवश्यक है और वह मात्र और मात्र साधनासे ही साध्य हो सकता है ।
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