सगुण गुरुके निर्गुण निराले माध्यम
मेरे श्रीगुरुने भिन्न माध्यमोंसे मुझे मात्र सिखाया ही नहीं अपितु मेरी साधनाकी दिशा योग्य है या नहीं, आगे मेरे लिए आवश्यक है, यह सब भी बताए हैं एवं भिन्न माध्यमोंसे मुझपर अपना स्नेह भी लुटाया है, इसी क्रममें यह लेख आपके समक्ष प्रस्तुत करती हूं –
जब ख्रिस्ताब्द २००८ के जनवरी माससे ही मुझे एकांतवासकी तीव्र तडप होने लगीं और गोवाके रामनाथी आश्रममें जहां मैं रह रही थी वहांके २०० साधकोंके निवास स्थानवाले आश्रममें मैं एकांत स्थान ढूंढती रहती; परन्तु वह सम्भव नहीं हो पाता था । मुझे ज्ञात नहीं कि वह साधनाकी कौन सी अवस्था थी जब मुझे मात्र मेरे भगवानजीके साथ रहनेकी तीव्र इच्छा होती थी, इससे पूर्व ऐसा कभी हुआ नहीं था । मुझे जो कक्ष रहने हेतु दिया गया था उसमें हम तीन या चार साधिकाएं रहती थीं, यद्यपि मूलतः अन्तर्मुखी होनेके कारण मुझे एकांत रहना प्रिय रहा है; परन्तु इसके साथ ही साधकोंका संग भी प्रिय रहा है; क्योंकि साधकोंके संग हम अपनी गुरुलीलाके विषयमें बातें कर सकते थे; परन्तु मैं जिस साधनाकी अवस्थाके मध्य थी तब मुझे किसीसे कोई भी विषयपर बात करना अच्छा नहीं लगता था, मन शांतिकी अनुभूतिसे अभिभूत हो रहा था और शब्दके स्तरपर उतरनेसे वह अनुसन्धान भंग हो जाता था । ऐसी स्थितिमें स्नानगृहमें एकान्तता ढूंढती थी या प्रातःका समय जब आश्रममें सभी साधक सो रहे हो तब आश्रममें रमण करना मुझे अच्छा लगता था । दो-चार बार विचार आये कि अपने पिताके मूल गांवमें उस आधे बने घरमें चली जाऊं और कुछ दिवस वहां रहकर आऊं; अल्प प्राणशक्तिके कारण ऐसा करना टाल रही थी, साथ ही अहम्-निर्मूलन चल रहा था तो यह भी द्वंद्व मनमें था कि कहीं ऐसा करना मनानुसार न हो जाए और मुझे श्रीगुरुके सान्निध्यसे सदैव दूर होनेका आदेश मिल जाए; किन्तु मेरे सर्वज्ञ सद्गुरुको तो सर्वज्ञात था और एक दिवस अकस्मात् मेरे श्रीगुरुका आदेश एक साधकमें माध्यमसे आया कि तनुजाको व्यष्टि साधना हेतु घर जानेको कहो ! अब घर तो था नहीं उसका परित्याग तो जुलाई १९९८ में ही कर दिया था और प्राणशक्ति भी ४५ % ही थी, हाथमें पैसे भी नहीं थे ! मैं सोचमें पड गई कि अब कहां जाऊं और क्या करूं, मुझे यह तो समझमें आ गया था कि यह सब परिस्थिति मेरे मनोभावका ही यह परिणाम था !
गोवा आश्रमसे निकलकर मैं सर्वप्रथम अपनी छोटी बहनके पास आई, वहां बीस दिवस रही; परन्तु जिस बहनसे मुझे अत्यधिक प्रेम है, साधनाकी उस अवस्थामें मुझे उसका सान्निध्य भी प्रिय नहीं लग रहा था, मैंने सोच लिया कि अब झारखण्डमें पिताके मूल स्थानपर जाकर ही कुछ समय एकांतवास करुंगी । मेरे मनकी अवस्थासे अनभिज्ञ मेरी बहनको मेरा यह निर्णय पूर्णत: अनुचित लगा; क्योंकि उसने मेरी स्वास्थ्यकी स्थिति देख ली थी और गांवमें कोई भी मूलभूत सुविधा भी उपलब्ध नहीं थी; अतः वे मुझे वहां जाने हेतु मना करने लगी । उसे किसी प्रकारसे यह बहाना बनाकर कि मैं आठ दिवसमें पुनः उसके पास दिल्ली आ जाउंगी, यह कहकर मैं अकेले ही झारखण्डके लिए निकल गई ।
झारखण्डमें ही पैतृक ग्राम जानेसे पूर्व एक संतके आश्रममें गई, ! वहां अब कोई संत नहीं रहते हैं, कुछ संन्यासी एवं साधक आश्रमकी देख-रेख करते हैं, गंगा तटपर वह एक रमणीय स्थान है, मैंने उस स्थानको देखकर सोचा प्रतिदिन गंगाजीका स्नान कर यहां एक कक्षमें एकान्तपूर्वक साधना करुंगी । मैं उस आश्रमके गुरुके समाधिस्थलपर जाकर उनसे सूक्ष्मसे प्रार्थना की कि वे मुझे अपने आश्रममें एक छोटा-सा स्थान दे दें, मुझे साधना हेतु एकांत चाहिए, आवश्यकता भी नाममात्र है, दो रोटी और एक छोटासा कक्ष चाहिये, उसके स्थानपर जो सम्भव होगा वह सेवा, मैं करनेका प्रयास करुंगी; परन्तु उनका कहना था, “तुम्हें तुम्हारे श्रीगुरुने आश्रमसे निकाला है, ऐसेमें मैं तुम्हें अपने आश्रममें रहनेके आदेश देनेकी धृष्टता नहीं कर सकता, तुम जाओ जहां बैठ जाओगी वह आश्रम हो जाएगा !” यह सुनकर मैं उस आश्रमके व्यवस्थापकसे मिली अब जब सूक्ष्मसे अनुमति नहीं मिली तो स्थूलसे कहांसे मिलती, वे बडे आदर-भावसे मिले, प्रेमसे बातें की और यह बताया कि वहां अभी कोई भी कक्ष रिक्त नहीं जहां मैं रह सकती हूं, मैं समझ गई, सूक्ष्मसे गुरुजीने समाधि स्थलपर जो कहा था उसकी स्थूल पुष्टि हो गई । मैं अपने गंतव्यकी ओर निकल गई ।
मैं गोड्डा स्थित अपने पिताके मूल निवास स्थानपर पहुंची, उससे पूर्व मैंने एक चटाई, दो-तीन बर्तन और तकिया ले लिया था, मेरे पास चौदह सौ रूपये शेष थे, प्रत्येक बार जब भी मैं अपने छोटे भाई-बहनसे मिलती वे मुझे पांच-दस सहस्र रूपये हाथमें रख देते, इस बार चूंकि मैं अपने बहनके विरोध करनेपर भी गांव आ गई थी वे मुझसे थोडी रुष्ट थी और उसने मुझे पैसे भी नहीं दिए थे, उसने सोचा कि पैसे नहीं होनेपर दीदी स्वतः ही मेरे पास पुनः आ जाएंगी ! परन्तु जबसे पूर्णकालिक हुई थी तबसे मुझे कभी पैसे नहीं रहनेपर भी कभी चिंता नहीं होती थी कि कल क्या होगा ! मुझे मेरे सर्वज्ञ सद्गुरुपर पूर्ण आस्था थी कि वे मेरा अति-उत्तम प्रकारसे संगोपन करनेमें समर्थ हैं ! गुरुतत्त्व हमारी आस्था अनुरूप ही कार्य करता है, मेरे ग्राम पहुंचनेपर जिस कक्षमें कुछ नहीं था वहां मात्र दो घण्टेमें पलंग, बिछावन, पंखा, बल्ब, सबकी व्यवस्था मेरे एक ऐसे सम्बन्धीने कर दी जिससे मैं कभी पूर्वमें मिली भी नहीं थी ! मैं विस्मृत होकर सब गुरुलीलाका भाग मानकर देखती रही, दो दिवस पश्चात् अकस्मात मेरा छोटा भाई आया उसने गांवके मन्दिरके पुनर्निर्माण, हमारे पैतृक निवासमें कुलदेवीके मन्दिरके पुनर्निर्माण हेतु एवं पिताजीके कक्षके नवीनीकरण हेतु मेरे हाथमें दो लाख रुपये रखे और इतना ही नहीं उसने एक ‘माचिस’से लेकर कूलरतक स्वयं सब कुछ क्रय कर लाकर मुझे देकर सब व्यवस्थित कर और पैसे भेजनेका आश्वासन देकर, एक दिवसमें ही चला गया ! मैं अपने श्रीगुरुके इन निर्गुण निराले स्वरूपोंके वर्तनको मात्र अचंभित होकर देखती रह गई !
जब भी मैं अपने निवास स्थानसे बाहर निकलकर चारों ओर होनेवाले निर्माण-कार्यके सञ्चालन हेतु समाजाभिमुख होती तो मुझे ज्ञात होता था कि इतने वर्ष सद्गुरुकी छत्रछाया और साधकोंके मध्य रहनेके पश्चात् अब सामान्य व्यक्तियोंके मध्य रहकर मुझे लगने लगा कि मैं कहां आ गई ? गांवसे सगे-सम्बन्धियोंमें धन-लोलुपता और धर्मके प्रति निष्क्रियता देखकर मेरा अन्तर्मन त्रस्त हो जाता ! मुझे लगा जैसे मैं सद्गुरुके आश्रम रुपी स्वर्गलोकसे निकलकर नरकमें आ गई हूं । मेरा मन व्यथित हो गया, मुझे लगा कि मैंने वहांसे पुनः कहीं और स्थानपर जाना चाहिए जहां मुझे समाजके इस स्वरुपके दर्शन ही न हो । ख्रिस्ताब २००८ के नवम्बर मासमें हमारे क्षेत्रके एक सिद्ध संतके आश्रममें सीता-विवाहका वृहद कार्यक्रम होता है; अतः मैंने वहां जानेका निर्णय लिया, जब मैंने उन संतके मंचपर बैठे स्वरुपके दर्शन कर उन्हें सूक्ष्मसे प्रणाम किया तो मैंने अपनी व्यथा उनसे कही और उनसे विनती की कि वे मुझे अपने आश्रमके एक कोनेमें मुझे साधना हेतु स्थान दे दें; परन्तु आश्चर्य उन्होंने भी वही कहा तो कुछ माह पूर्व एक संतने सूक्ष्मसे अपने समाधि-स्थलसे कही थी । मैंने पुनः सोचा कि हो सकता है यह मेरे मनका भ्रम हो; अतः मैंने उनसे कहा कि यदि आप कार्यक्रमसे जानेसे पूर्व मेरे पाससे होकर जाएं तो मैं मान जाउंगी कि आपने सूक्ष्मसे जो कहा वह सत्य है और आश्चर्य गुरुजी मंचसे सीधे अपने निवास स्थानकी ओर न जाकर गोल घूमकर मेरे पाससे निकल कर गए ! मैं समझ गई कि मेरे श्रीगुरुने मेरे लिए कुछ और ही निर्धारित कर रखा है, मैं उन्हें प्रणाम कर अपने निवास स्थान लौट आई कि इसे ही आश्रम बनाना है और यहां ही गुरुलोक बसाना है !
आज जब गोड्डा और देहलीके स्थान जहां मैं रहती हूं उसे ईश्वरने और कुछ संतोंने ‘आश्रम’का संबोधन दे दिया है और देहलीके आश्रममें एक कक्ष जिसे मैं अपने श्रीगुरुका कक्ष मानती हूं एवं वहींपर सेवा और निवास करती हूं, वहांके सनातनके रामनाथी आश्रमके टाइल्स पारदर्शी हो गए हैं अर्थात् ईश्वरने वह स्थान आश्रम बन चुका है, इसकी पुष्टि हेतु स्थूल प्रमाण भी दे दिए हैं, तो उन दोनों संतोंके सूक्ष्मसे दिए गए सन्देशोंका भावार्थ सत्य होता देखा मन श्रीगुरुके प्रति कृतज्ञतासे भर जाता है ! – तनुजा ठाकुर (३१.१२.२०१६)
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