जब आटा और करेलेने दे दिया धोखा !


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मेरे अहं निर्मूलनकी साधनाके चरणके अन्तर्गत अपने कुछ प्रसंग आपके साथ साझा कर रही हूं | गुरुतत्त्व जब शिष्यको सिखाने हेतु तत्पर हो जाता है तब किस प्रकार जड-चेतन सब कुछ जिसमें ब्रहम रुपी गुरुतत्त्व व्याप्त होता है वे  साधककी साधनामें सहायता कर, उसे अन्तर्मुख करते हैं, यह प्रतिबिम्बित करना यह इस लेखका मुख्य हेतु है |
मेरी माताजी एक साधक प्रवुत्तिकी सुघड गृहिणी थी; अतः उन्होंने कब और कैसे मुझे गृहकार्यमें दक्ष कर दिया, मुझे भी इसका भान नहीं हुआ; क्योंकि मेरा ध्यान गृहकार्यमें विशेष नहीं रहकर, अध्ययनमें रहता था , साथ ही स्वास्थ्य ठीक न रहनेके कारण मुझसे शारीरिक स्तरकी सेवायें माताजी नहीं करवाती थीं | मैंने प्रतिदिनके भोजन बनाना सीख लिया था और माताजीके ख्रिस्ताब्द १९९२ में अत्यधिक अस्वस्थ होनेपर मैंने कुछ माह रसोईघरके उत्तरदायित्वको सम्भाला था | वस्तुतः मुझे भोजन बनाना और खिलाना कबसे अच्छा लगने लगा मुझे भी इसका भान नहीं है | और इसे कहनेमें मुझे तनिक भी संकोच नहीं कि मैं अनेक प्रकारके स्वादिष्ट और स्वास्थवर्धक भोजन बना सकती हूं, इसका मुझे सूक्ष्म अहं भी हो गया था |
वर्ष २००४ में मेरी अहं निर्मूलनकी साधना आरम्भ हुई जिसके अन्तर्गत हमसे प्रसारमें हुई समष्टिको हानि पहुंचानेवाली चूकोंके कारण हमसे प्रसारकी सेवा (ब्राह्मण वर्णकी सेवा) ले ली गयी और हमें  आश्रमके विभिन्न विभागमें शुद्र वर्ण (शारीरिक स्तरकी) सेवा दी गयी | इसी क्रमें सर्वप्रथम हमें रसोईघरमें सेवा दी गयी | मई २००४ की बात है, मैं उस समय गोवाके आश्रममें थी | वहां उस समय १२० साधकोंका भोजन बनता था और हम दस कुल साधक उस विभागमें थे | एक दिवस मुझे एक साधकने रोटीके लिए गुंदे जानेवाले आटेमें नमक देनेके लिए कहा | उस समय चूंकि मेरा सूक्ष्म अहं अधिक बढ गया था; इसलिए मुझे सभीसे पूछ-पूछ कर सेवा करनेके लिया कहा गया था | मुझे लगा आटेमें कितना नमक डालना है, इसके बारे क्या पूछना ?,  अतः मैंने हाथसे नमक डिब्बेसे निकाला और आटेमें डाल दिया | इसी मध्य एक साधिकाने कहा “दीदी,  नमकके डिब्बेमें जो चम्मच है, उससे मापकर दो चम्मच नमक आटेमें डालना” | मैंने उनकी नहीं सुनी सोचा, चार किलो आटेमें  कितना नमक डालना है इतना तो पता ही है मुझे और इतने वर्षोंका अनुभव भी तो है ; अतः मैंने अनुमानसे नमक डाल दिया;  परंतु आश्चर्य, उस दिवस नमक अधिक हो गया मुझे  अपने अनुमानकी क्षमतापर कहीं न कहीं जो  अहं था, जो उस दिन रोटी खानेपर, पहली बार धराशायी हो गया और मैं आश्चर्यचकित हो गयी,  नमक इतना  अधिक हो गया था कि ऐसा लगा जैसे मैंने दो बार नमक डाल दिया हो !
चार दिवस पश्चात एक मराठी साधिकाने कहा आप उत्तर भारतमें जिस प्रकारसे करेलेकी तरकारी(सब्जी) बनाते हैं, वैसी पद्धतिसे करेले बनाएं | मैंने अधिकतम बीस व्यक्तिके लिए भोजन बनाया था और अब सौ  साधकोंके लिए करेलेकी सब्जी बनानी थी, सो विभागकी एक साधिकासे मैंने करेलेके  सब्जी हेतु कढाईमें तेल डालनेके लिए कहा, जब वे तेल डाल कर चली गईं तो मुझे सन्तुष्टि नहीं हुई और मैंने थोडा सा और तेल डाल दिया | मैंने करेलेमें थोडा ही तेल डाला था; परन्तु तेल इतना अधिक हो गया कि मेरी लुटिया पुनः डूब गयी और करेलेने मुझे धोखा दे दिया और मुझे मेरी चूक फलकपर लिखनी पडी | ( हमारे आश्रमकी पद्धति अनुसार हमें हमारे सारे महत्वपूर्ण चूक फलकपर लिखनी पडती है ) मुझे ईश्वरकी इस लीलापर आश्चर्य हो रहा था;  क्योंकि जिस प्रकार करेलेसे तेल छपक कर नाच रहा था, उतना तेल मैंने नहीं डाला था और मैं समझ गयी मेरे अहं निर्मूलन हेतु रसोई घरकी सर्व सामग्री गुरुसेवामें तत्पर हो गयी हैं | और ऐसा अनेक बार हुआ जब भी मैं अपनी बुद्धि लगाती तो कुछ न कुछ गडबड हो जाता था और इससे मुझे समझमें आ गया था कि मेरे गुरुका निर्गुण तत्व, मेरे अहं निर्मूलन हेतु कार्यरत हो गया है अतः मैं सब कुछ पूछ-पूछ कर सेवा करने लगी | – तनुजा ठाकुर



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