एक क्षण भी व्यर्थ व्यतीत न करते हुए सातत्यसे साधना करनेका कारण


१). अपने पूर्व जन्मके पुण्यसे हमें मनुष्य जन्म प्राप्त हुआ है | मनुष्य
जन्ममें ही साधना करना सरल होता है, मनुष्य जन्ममें ही अध्यात्मिक
प्रगति हो सकती है । अगला जन्म मनुष्यका मिलेगा यह आवश्यक नहीं होता ।
२). शारीरिक एवं मानसिक स्वस्थता होनेपर हम कोई भी साधना कर सकता है ।
भविष्यमें किसी व्याधि अथवा अपंगत्वसे शरीर अस्वस्थ नहीं होगा यह निश्चित नहीं ।
३) किसी भी आपत्तिसे हमारे भविष्यके नियोजन एवं स्वप्न भंग हो सकते हैं ।
४) साधना हेतु उपयोगमें लाया गया हर क्षण अमूल्य है । इसके विरुद्ध मायामें
असत् वस्तुओंसे प्राप्त सुख हेतु बिताया गया हर क्षण अध्यात्मिक प्रगति हेतु घातक होता है|
५) हम कब तक जीवित रहेंगे कोई नहीं बता सकता मृत्यु किसी भी क्षण आ सकता है ।
हमारा आयुष्य क्षणभंगुर एवं अध्यात्म अनंत है |  यह ध्यान रखना चाहिये ।
६) अध्यात्मिक प्रगति हेतु श्री गुरुके मार्गदर्शनकी आवश्यकता होती है अतः
गुरुप्राप्तिका प्रयास करें। गुरुप्रप्तिपर गुरुसानिध्य कितने दिन मिलेगा यह भी नहीं बता सकते ।
७) प्रारब्धकर्मानुसार व्यक्तिका आयुष्य निर्धारित होता है, हम कबतक जीवित रहेंगे
कोई नहीं जानता ।
आयुःक्षणलवमात्रं न लभ्यते हेमकोटिभिः क्वापि ।
तच्चेद्गच्छति सर्वं मृषा ततः काऽधिका हानिः ॥
– आद्य शंकराचार्य (प्रबोधसुधाकर, प्रकरण १, श्‍लोक १६)
अर्थ : कोटि-कोटि रुपये देनेपर भी एक क्षण भी आयु बढाई नहीं जा सकती अतः
जीवनका हर क्षण मूल्यवान होता है । अतः उसे साधना हेतु ही व्यतीत करना
चाहिये।
भगवान कृष्ण भगवत गीतामें कहते हैं मनुष्यकी अंतिम इच्छानुसार ही अगला
जन्म मिलता है, हम अपनी अंतिम इच्छा एवं क्षण निश्चित नहीं कर सकते; अतः
सातत्यसे साधना करनेपर मृत्युके क्षण भी साधना होगी एवं अगले जन्ममें भी
साधना चलती रहेगी । – पू.  डॉ. वसंत  आठवले (ख्रिस्ताब्द १९८१)
संदर्भ – मराठी दैनिक सनातन प्रभात ( २६/१० /२०१३)



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