संस्कृत है अँग्रेजीकी जननी


संस्कृत है अँग्रेजी की जननी
‘सप्तांबर, अष्टांबर, नवाम्बर, दशाम्बर’ आपके मनमें, कभी प्रश्नउठा होगा कि अंग्रेज़ी महीनों के नाम जैसे कि, सप्टेम्बर, ऑक्टोबर, नोह्वेम्बर, डिसेम्बर कहीं, संस्कृत सप्ताम्बर, अष्टाम्बर, नवाम्बर, दशाम्बर जैसे शुद्ध संस्कृत रूपोंसे मिलते क्यों प्रतीत होते हैं? विश्व की और विशेषतः युरप की भाषाओं में संस्कृत शब्दों के स्रोत माने जाते हैं।
इस विषय की कुछ कडियां, जो आज शायद लुप्त हो चुकी हैं, उन्हें जानने, इस लेखकने जो काम किया है,वह आपके सामने प्रस्तुत करता हूं। जो जुड़ती कडियों का अनुसंधान मिलता है, वह पाठकों केसामने रखने में, एक सांस्कृतिक गौरव की अनुभूति भी छू कर आह्लादित कर देती है। आप सभी को इस आनंद-गौरव में सहभागी होने के लिए, आमंत्रण हैं।
क्या यह आकस्मिक घटना है? एक साथ अनुक्रम में, निरंतर चारों महीनों के नाम अंग्रेज़ी में आएं, ऐसी, आकस्मिक घटना होनेकी संभावना, नहीं के बराबर है। जो विद्वान संभावना (प्रॉबेबिलिटी)की, अवधारणा से परिचित है, वें इसे आकस्मिक मानने के लिए तैय्यार नहीं होंगे। पर प्रश्न यह भी है, कि, यदि सप्ताम्बर-सेप्ट ेम्बर है, तो वहअंग्रेजी कॅलेंडर में, क्रम में नववां महीना कैसे हुआ? और उसी प्रकार, फिर अष्म्बर-ऑक्टोबर -दसवां, नवाम्बर-नोह्वेम ्बर-ग्यारहवां, और दशाम्बर-डिसेम्ब र-बारहवां, कैसे हुए?
इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने और संदर्भ खोजने के लिए, एन्सायक्लोपिडीय ा ब्रिटानिका का विश्व कोष छानकर देखा, और कुछतथ्य हाथ लगे। संक्षेप में निम्न बिंदुओं की ओर ध्यान आकर्षित हुआ। इस विश्व कोष में, कॅलेन्डर के विषय में वैसे और भीजानकारी है। ईसवी सन, 1750 के आसपास आज कल उपयोग में लिया जाताकॅलेंडर स्वीकारा गया, जिसे ग्रेगॅरियन कॅलेंडर के नाम से जाना जाता है। उसके पहले ज्युलियन कॅलेंडर उपयोग में लिया जाता था। ऐसा भी दिखाइ देताहै, कि, पुराने कॅलेंडरों के अनुसार मार्च महीने से ही वर्ष प्रारंभ होता था। यह वस्तुस्थिति ध्यान देने योग्य हैं, क्यों कि, यदि, मार्च महीने से ही वर्ष प्रारंभ हो, तो, सितम्बर सातवां महीना होता है, फिर अक्तुबर आठवां, नवम्बर नववां, और डिसम्बर दसवां महीना होगा।
दूसरा एक सहज दिखाइ देनेवाला तथ्य भी, मार्च से ही नये वर्ष के प्रारंभ की, पुष्टि करता है। वह है, फरवरी में, हर चार वर्ष में आता हुआ, लिप वर्ष का सुधार।कोई भी सुधार सामान्यतः अंत में ही किया जाता है। बहुत सारी ब्यौपारी पेढियां, वर्ष के अंत में ही, हिसाब बराबर करती हैं। आय-कर(Income Tax)का हिसाब भी, वर्षानुवर्ष डिसम्बर के अंत तक, देना होता है।
तो यह प्रश्न कि, फरवरी में ही क्यों, लिप वर्षका सुधार आता है?बडा ही तर्क संगत है। इसका उत्तरकहीं, इतिहास की जमा धूल के नीचे,छिप कर बैठा है। लगता है, कि कभी न कभी तो फरवरी वर्ष का अंतिम महीना रहा होगा। कोइ वर्ष के बीचही कारण बिना, ऐसा सुधार करे, यह संभव नहीं, मैं तो ऐसा होना तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टिसे असंभव मानता हूं। एक और कारण भी स्पष्ट है, कि अन्य माह 30 या 31 दिन के होते हैं ; फिर क्यों,अकेले फरवरी को 28 या 29 दिन देकर पक्षपात किया गया? तो यह फरवरी का लिप वर्ष का सुधार, एक; और 28 या 29 दिनके अवधि का माह होना, दूसरा; यह दोनो तथ्य फरवरीके वर्षान्त माह होने की पुष्टि करते हैं। अर्थात् मार्च कभी तो पहला महीना रहा होगा, यह तथ्य भीइसीसे प्रमाणित होता है।
तीसरा तथ्य भी इस के साथ जोडना आवश्यक है, वह यह है, कि, भारतीय शालिवाहन शक का वर्ष गुडी पडवा (वर्ष प्रतिपदा, युगादि)से ही माना जाता है। और हिंदू तिथि और अंग्रेज़ी डेट प्रायः आगे पीछे हुआ करती है। महाराष्ट्र, कर्नाटक सहित दक्षिण में सभी परंपराएं शालिवाहन शक मानती हैं। शालिवाहन शक के वर्ष का प्रारंभ, वर्ष-प्रतिपदा जो मार्च में आती है, उसी से होता है। इस ईसवी सन 2010 के वर्ष में, 16 मार्च को शक संवत 1932प्रारंभ हुआ था, और साथ साथ विक्रमी संवत 2067 भी प्रारंभ हुआ था। युगाब्द का 5111 वां वर्ष भी इसी दिनसे प्रारंभ हुआ था।
पाठकों को अब ध्यान में आया होगा, कि क्यों, सितम्बर सातवां, अक्तुबर आठवां, नवम्बर नववां, औरडिसम्बर दसवां होने का आभास होता है। वैसे अम्बर अर्थात, आकाश भी संस्कृत शब्द ही है। हो सकता है कि सप्ताम्बर = सप्त+अम्बर का अर्थ संदर्भ भी, आकाश का सातवां भाग इस(एक राशि) अर्थ की व्युत्पत्ति से जुडा हो।
इंग्लैंड का इतिहास: इंग्लैंड में सन 1752 तक 25 मार्च को नवीन वर्ष दिन मनाया जाता था। सन१७५२ में पार्लामेंट के प्रस्ताव द्वारा कानून पारित कर, नवीन वर्ष का प्रारंभ 1 जनवरी को बदला गया था।
मार्च 25 को नये वर्षका प्रारंभ मानने के पीछे, क्या ऐतिहासिक कारण हो सकता है? यह भी कहीं इतिहास के अनजाने अज्ञात रहस्यो में खो गया है। आजकुछ अनुमान ही किया जा सकता है। कारण हो सकता है, कि इंग्लैंड कावैदिक गुरुकुल शिक्षा पद्धति औरवैदिक पंचांग से जिस वर्ष संबंध टूटा होगा, उस वर्ष वैदिक गणित के अनुसार २५वी मार्च को प्रारंभ होनेवाला, भारतीय नव वर्ष रहा होगा।
संभवतः, जिस प्रकार घडी को उलटी दिशा में घुमाते घुमाते हर बीते हुए दिन का समय और वार हमें प्राप्त हो सकता है, उसी प्रकार कॅलेंडर को भी उलटी दिशा में गिनते गिनते हम २५ वी मार्च से प्रारंभ होने वाला शक संवत खोज सकते हैँ -तनुजा ठाकुर

 



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