अमृतवाणी


संत तुलसी दास रचित रामचरित मानसके बालकांडसे उद्धृत
गुरु वंदना

* बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥
भावार्थ : मैं उन श्रीगुरुके चरणकमलकी वंदना करता हूं, जो कृपाके समुद्र और नर रूपमें श्री हरि ही हैं और जिनके वचन महामोह रूपी घने अन्धकारका नाश करनेके लिए सूर्य किरणोंके समूह हैं॥
चौपाई :

* बंदऊँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥

अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥1॥

भावार्थ : मैं गुरु महाराजके श्रीचरणकमलोंकी रजकी वन्दना करता हूं, जो सुरुचि (सुंदर स्वाद), सुगंध तथा अनुराग रूपी रससे पूर्ण है । वह अमर मूलका (संजीवनी जडी) सुंदर चूर्ण है, जो सम्पूर्ण भव रोगोंके परिवारको नाश करनेवाला है ॥

* सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती॥

जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी॥2॥

भावार्थ : वह रज सुकृति (पुण्यवान्‌ पुरुष) रूपी शिवजीके शरीरपर सुशोभित निर्मल विभूति है और सुंदर कल्याण और आनन्दकी जननी है, भक्तके मन रूपी सुंदर दर्पणके मैलको दूर करनेवाली और तिलक करनेसे गुणोंके समूहको वशमें करनेवाली है॥

* श्री गुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती॥

दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥3॥

भावार्थ : श्री गुरु महाराजके चरण-नखोंकी ज्योति मणियोंके प्रकाश समान है, जिसके स्मरण करते ही हृदयमें दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। वह प्रकाश अज्ञान रूपी अन्धकारका नाश करनेवाला है, वह जिसके हृदयमें आ जाता है, उसके बडे भाग्य हैं ॥

* उघरहिं बिमल बिलोचन ही के। मिटहिं दोष दुख भव रजनी के॥

सूझहिं राम चरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक॥

भावार्थ : उसके हृदयमें आते ही हृदयके निर्मल नेत्र खुल जाते हैं और संसार रूपी रात्रिके दोष-दुःख मिट जाते हैं एवं श्री रामचरित्र रूपी मणि और माणिक्य, गुप्त और प्रकट जहां जो जिस खानमें है, सब दिखाई पडने लगते हैं ||

 

 

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