साधको! प्रगतिका विचार करनेके स्थानपर सतत सतमें रह पाना है अधिक महत्त्वपूर्ण !


मानो दो व्यक्तियोंको एक समान वेतन प्राप्त होता है । एकके वेतनका कुछ भाग ऋण न होनेसे बचा रहता है, तो दूसरेका महीनेका व्यय पूर्ण होनेपर बचा हुआ भाग ऋण चुकानेमें व्यय हो जाता है । इसका अर्थ यह है कि जिसे ऋण है, उसका प्रारब्ध तीव्र है । वह ऋण चुकाकर अपना प्रारब्ध न्यून कर रहा है; उसीप्रकार इतने वर्ष साधना करनेसे प्रगति क्यों नहीं होती ? ऐसा विचार मनमें न लाएं । प्रारब्धका न्यून (कम) होना भी प्रगतिका ही लक्षण है । साधनाकर, सतमें रह पाना महत्त्वपूर्ण है । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था



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