मैंने ऐसा पाया है कि सात्त्विक प्रवृत्तिके व्यक्तिको प्राकृतिक चिकित्सामें सहज विश्वास होता है और राजसिक एवं तामसिक प्रवृत्तिके व्यक्तियोंको आधुनिक चिकित्सा पद्धतिमें अधिक विश्वास होता है | जब किसी साधकको शारीरिक कष्ट रहता है और वह आध्यात्मिक स्वरुपका अल्प ही होता है तो मैं उन्हें शारीरिक स्तरपर उपाय करने हेतु प्राकृतिक चिकित्सा अंतर्गत आयुर्वेद, सूची-दाब(एक्यूप्रेशर) पद्धति या योग इत्यादिका सहयोग लेने हेतु कहती हूं तो वे झटसे कहते हैं कि मेरा कष्ट तीव्र है और वह एलोपैथीसे ही ठीक होगा या नियंत्रित रहेगा |
यह निरीक्षण मैंने अनेक बार किया है और यह भी देखा है कि सात्त्विक प्रकृतिके व्यक्तिके यदि प्रारब्ध तीव्र न हो तो उनकी सात्त्विक जीवनशैलीके कारण, वे अधिक स्वस्थ रहते हैं और उन्हें अल्प प्रमाणमें शारीरिक और मानसिक कष्ट होते हैं | विशेषकर मैंने विदेशोंमें पाया है कि वे स्वच्छता एवं स्वास्थ्यको लेकर अत्यधिक सजग होते हैं तब भी उन्हें अधिक प्रमाणमें शारीरिक ही नहीं अपितु मानसिक कष्ट भी होते हैं ! मैंने अपने शोधमें यह भी पाया है कि प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति अत्यधिक सूक्ष्म स्तरपर कार्य करनेके कारण यदि उस पद्धतिसे उपचार करनेवालेको उस शास्त्रपर विश्वास न हो तो उन्हें उसका लाभ भी अल्प प्रमाणमें मिलता है या नहीं मिलता है | – तनुजा ठाकुर (१७.१०.२०१४)