सितम्बर ५, २०१८
उच्चतम न्यायालयने उस पुस्तकपर प्रतिबन्ध लगानेके लिए प्रविष्ट याचिका बुधवारको रद्द कर दी, जिसमें एक हिन्दू महिलाके मन्दिरमें जानेको कथित रूपसे अपमानजनक ढंगसे प्रस्तुत किया गया था ।
प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूडकी पीठने याचिका रद्द करते हुए कहा कि किसी लेखकके कार्य कौशलका सम्मान किया जाना चाहिए और पुस्तकको अंशोंके स्थानपर सम्पूर्णतामें पढा जाना चाहिए ।
पीठने दिल्ली निवासी एन राधाकृष्णनकी याचिकापर अपने निर्णयमें कहा कि किसी पुस्तकके बारेमें अपने दृष्टिकोणको सेन्सरशिपके लिए वैधानिक घेरेमें नहीं लाना चाहिए । पीठने कहा कि लेखकको अपने शब्दोंका उसी प्रकार से खेलनेकी अनुमति दी जानी चाहिए, जैसे एक चित्रकार रंगोंसे खेलता है ।
याचिकाकर्ताने अपनी याचिकामें लेखकर एस. हरीशकी मलयाली उपन्यास ‘मीशा’के कुछ अंश हटानेका अनुरोध किया था ।
शीर्ष न्यायालयने दो अगस्तको पुस्तकोंपर प्रतिबन्धके चलनकी आलोचना करते हुए कहा था कि इससे विचारोंका स्वतन्त्र प्रवाह बाधित होता है । न्यायालयने यह भी कहा था कि साहित्यिक कार्य उसी समय प्रतिबन्धित किया जा सकता है, जब वह भारतीय दण्ड संहिताकी धारा २९२ जैसे किसी विधानका उल्लंघन करता हो ।
राधाकृष्णनने याचिकामें आरोप लगाया था कि पुस्तकमें मन्दिरोंमें पूजा कराने वाले ब्राह्मणोंके बारेमें की गई टिप्पणियां ‘जातीय आक्षेप’ जैसी हैं । इसमें यह भी आरोप लगाया गया था कि केरल शासनने इस पुस्तकका प्रकाशन, इसके आन लाइन विक्रय और उपन्यासकी उपलब्धता रोकनेके लिए उचित पग नहीं उठाए ।
केन्द्र और राज्य शासन दोनोंने ही पुस्तकपर प्रतिबन्धके लिए याचिकाका विरोध करते हुए कहा था कि अभिव्यक्तिकी स्वतन्त्रताको बाधित नहीं किया जाना चाहिए ।
“जैसे ही प्रश्न हिन्दू, उनकी आस्था व सम्मानका आता है, ये सभी न्यायाधीश आत्मज्ञानी कैसे बन जाते हैं एवं यही निर्णय मुसलमानों अथवा इसाईयोंके लिए, उनके धार्मिक हितोंका ध्यान रखते हुए, कैसे परिवर्तित हो जाता है ?, बताना कठिन है !” – सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : लाइव हिन्दुस्तान
Leave a Reply