आयुर्वेदके ग्रन्थ ‘वाग्भट्ट’में उबटनके सम्बन्धमें लिखा है :
उद्धर्तनं हरं मेदसः प्रविलापनम् ।
स्थिरी करण मंगानां त्वक प्रसादकरं परम ॥
उत्साद नाद भवेत स्त्रीणां विशेषात कान्दिमवपुः ।
प्रहर्स सौभाग्य मृजा लाघवादि गुणान्वितम् ॥
अर्थात उबटनसे कफ और वसा (चर्बी) कम हो जाती है । उबटनके प्रयोगसे स्त्रियोंको तो विशेष रूपसे लाभ होता है अर्थात उनके शरीरकी कान्ति, प्रसन्नता, सौभाग्य, स्फूर्ति तथा हल्कापन आदि सभी बढते हैं ।
स्मरण रहे, बाहरके उबटनोंका प्रयोग भूलसे भी नहीं करना चाहिए ! उबटनके पश्चात भी स्नान तथा त्वचापर तेलकी चिकनाईको रगड-रगडकर पोंछ डालना स्वास्थ्यकी दृष्टिसे उत्तम तथा आवश्यक है ।
दुग्धस्नान : सौन्दर्यप्रिय स्त्रियां यदि सौन्दर्यकी वृद्धिका कोई प्राकृतिक उपचार परामर्श चाहती हैं तो उन्हें अन्य आवश्यक प्राकृतिक व्यवस्थाओंके साथ ही साथ दुग्धस्नान करना चाहिए ! दूधमें मैल काटनेका असाधारण गुण विद्यमान है । यही कारण है कि हलवाई लोग चीनी अथवा गुडकी चाशनी बनाते समय उसमें दूध मिले पानीके छींटे अवश्य देते हैं, जिससे सारी अस्वच्छता और मैलापन छंटकर पृथक हो जाता है । इसी प्रकार दुग्ध स्नानको नियमपूर्वक और नित्य-प्रति करते रहनेसे काले रंगके मनुष्य भी बहुत कुछ गोरे हो जाते हैं तथा साथ ही उनके चर्मरोग जैसे कील, मुहांसे, सेहूंआ, झाई आदि तो कभी होते ही नहीं ।
दुग्धस्नानकी विधि : थोडा-थोडा दूध लेकर शरीरके अङ्ग-प्रत्यंगपर चुपडें और मर्दन (मालिश) करें ! मर्दन (मालिश) उस समयतक करें जबतक कि दूध शरीरके मैलके साथ मिलकर सूखा-सूखा होकर पृथ्वीपर झड न पडे । इस भान्ति दूधका मर्दन (मालिश) पूरे शरीरपर कर लेनेके पश्चात शुद्ध ठण्डे जलमें मल-मलकर स्नान करें ! तत्पश्चात तनको सूखे तौलिएसे रगड-रगडकर पोंछ लेनेके पश्चात वस्त्र पहन लें ! यही दुग्धस्नान है ।
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