शास्त्र वचन
कृते शुक्लश्चतुर्बाहू: जटिलो वल्कलाम्बर: ।
कृष्णाजिनोपवीताक्षान बिभद दण्डकमण्डलु ।।
अर्थ : सत्ययुगमें भगवानका श्वेत वर्ण होता है, वे चार भुजाएं, सिरपर जटा, वल्कल वस्त्र, काले मृगका चर्म, यज्ञोपवीत, रुद्राक्षकी माला, दण्ड और कमण्डलु धारण करते हैं ।
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त्रेतायां रक्तवर्णोंsसौ चतुर्बाहुस्त्रिमेखल: ।
हिरण्यकेश: त्रय्यात्मास्त्रुक स्त्रुवादि उपलक्षण: ।।
अर्थ : त्रेतायुगमें उन भगवानका रंग लाल होता है, वे चार भुजाएं धारण करते हैं । उनके केश स्वर्णिम आभा लिए (सुनहरे) होते हैं और वे वेदप्रतिपादित यज्ञके रूपमें रहकर स्रुक, स्रुवा आदि यज्ञपात्रोंको धारण करते हैं ।
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द्वापरे भगवान् श्याम: पीतवासा निजायुध: ।
श्रीवत्सादिभि: अड.कैश्च लक्षणे: उपलक्षित: ।।
अर्थ : द्वापरयुगमें भगवानका रंग श्यामल (सांवला) होता है । वे पीताम्बर, शंख और चक्र आदि आयुध धारण करते हैं । वक्ष:स्थलपर श्रीवत्स आदि चिह्नोंसे और अनेक लक्षणोंसे उनका अभिज्ञान होता है ।
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कृष्णवर्ण त्विषाकृष्णं साग्ड़ोपांगडास्त्र पार्षदम ।
यज्ञे: सड.कीर्तनप्राये: यजन्ति हि सुमेधस: ।।
अर्थ : कलियुगमें काले रंगकी कान्तिसे, अंगों और उपांगों; अस्त्रों एवं पार्षदोंसे युक्त श्रीकृष्णकी श्रेष्ठ बुद्धिसम्पन्न पुरुष यज्ञोंद्वारा और प्रधान रूपसे नामसंकीर्तन आदिद्वारा आराधना करते हैं ।
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