शास्त्र वचन
अतो विमुक्त्यै प्रयतेत विद्वान् संन्यस्तबाह्यर्थसुखस्पृह: सन् ।
सन्त महान्त समुपेत्य देशिकं तेनाप्दिष्टार्थसमहितात्मा ।। – विवेकचूडामणि
अर्थ : विद्वान पुरुषोंको सम्पूर्ण बाह्य भोगोंकी इच्छा त्यागकर सन्त शिरोमणि गुरुदेवके शरणमें जाकर उनके उपदेश किए हुए विषयोंको आत्मसातकर मुक्ति हेतु प्रयत्न करने चाहिए ।
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