शास्त्र वचन
योगेन चितस्य पदेन वाचां ।
मलं शरीरस्य च वैद्यकेन ॥
यो पाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां ।
पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोस्मि ॥
अर्थ : वाणीमें अशुद्धता न रहे, वाणी शुद्ध हो जाए, शब्दोंका मर्म समझमें आ सके, शब्दोंका सामर्थ्य समझमें आ सके, इसलिए महर्षि पतञ्जलिने शेषरूप अर्थात अपने मूलरूपमें व्याकरणशास्त्रकी रचना की ।
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