अज्ञानप्रभवो मोहः पापभ्यासात् प्रवर्तते ।
यदा प्राज्ञेषु रमते तदा सद्यः प्रणश्यति ॥
अर्थ : भीष्म, युधिष्ठिरसे मोहकी उत्पत्तिका कारण बताते हुए कहते हैं : मोह अज्ञानसे उत्पन्न होता है और पापकी आवृत्तिसे बढता है । जब मनुष्य, विद्वानोंमें अनुराग करता है, तब उसका मोह तत्काल नष्ट हो जाता है ।
क्षत्रजं सेवते कर्म वेदाध्ययनसंगतः ।
दानादानरतिर्यस्तु स वै क्षत्रिय उच्यते ॥
अर्थ : भरद्वाज मुनिसे, भृगु ऋषि कहते हैं : जो क्षत्रियोचित युद्ध आदि कर्मका सेवन करता है, वेदोंके अध्ययनमें लगा रहता है, ब्राह्मणोंको दान देता है और प्रजासे कर लेकर उसकी रक्षा करता है, वह क्षत्रिय कहलाता है ।
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